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Thursday, December 22, 2011

चंचल मन

जिस प्रकार समंुद्र की कोई सीमा या गहराई नही होती वह विशाल, गहरा और अमर्यादित होता है उसी प्रकार हमारे मन को खुला छोड़ दे तो मन के कल्पना की भी कोई मर्यादा, सीमा या गहराई नही होती।


खुशनुमा मौसम, अवकाश का दिन...........चिड़ियाओं की चहकने की संगीत लहरियां......... शहर के बगीचें में बैठा प्रकृति का आनन्द उठा रहा हूँ..........हाथ की कलम मन के उद्गारों को कागज पर उकेरने के लिए बेताब.........  प्रफुल्लित चंचल मन इधर-उधर भटक कर सामने पेड़ों पर अटक गया..........एक बन्दर इस टहनी से उस टहनी, इस पेड़ से उस पेड़ पर उछल रहा है। यदि किसी टहनी पर रूक भी जाता है तो बैठा- बैठा तरह तरह की हरकतें करने लगता है। उसको देखकर मुझे लगा कि एक बन्दर मेरे अंदर भी तो है “ मन रूपी बन्दर “। वो भी तो कभी एक जगह नही टिकता है हमेशा विभिन्न क्रिया कलापों में या ऐसी कल्पनाओं में खोया रहता है जिनकी ना तो कोई दिशा होती है। और ना ही अस्तित्व होता है बस सदैव चंचल और चलायमान बना रहता हैं।
 लेकिन शायद मेरे मन को अपनी तुलना बन्दर से करना अच्छा नही लगा और उसने पलट कर स्वयं मेरे से ही प्रश्न पूँछ लिया कि क्या मैं चंचल हूॅ ? और यदि हूँ भी तो क्या मुझे चंचल नही होना चाहिए ? उसके प्रश्न ने मुझे सोच में डाल दिया मैं विभिन्न उत्तर और उनके कटाक्ष सोचने लगा। लेकिन मैं अपने किसी उत्तर से सन्तुष्ट नही हो पाया इसलिए इस प्रश्न को मैने आप से साझा करने का निर्णय लिया । अब मैं अपने मन में आये विभिन्न विचारो को आपके समक्ष रख रहा हूँ । आप ही सही निर्णय करके बताएं और अपने-अपने मन को भी समझा दें।
 हमारा मन ( संस्कृत में मनस ) शरीर का वह भाग है जिसमें हमारे विचार उत्पन्न होते है, विज्ञान हमारे मन कि तीन अवस्थायें (चेतन, अर्द्धचेतन, अचेतन) बताता है । इसमे से मन का मात्र दस प्रतिशत हिस्से चेतन मन से हम अपने दैनिक क्रिया कलाप करते है, शेष 90 प्रतिषत हिस्सा अचेतन मन हमारा कल्पना लोक होता है और हमारे याद करने, निर्णय लेने या अपनी ईच्छा-अनिच्छा आदि दिखाने के समय हमारे मन की अर्द्ध चेतन अवस्था काम आती है। इसके अलावा हमारे मन की अनगिनत दशायें जिन्हें हम प्रति क्षण महसूस करते है जैसे - स्नेह, दया, ममता, त्याग, विश्वास, आत्मसर्मपण, श्रद्धा, संवेदना, कामवासना, मोह, वात्सल्य, कौतूहल, ईर्ष्या, द्वेष, करूणा, गुस्सा, जिज्ञासा, आशा, निराशा आदि।
     
       अब आगे बढने से पहले हमारे सामने यह प्रशन आता है कि इस मन का जन्म हमारे शरीर में होता कब है ? इसको ऐसे समझने की कोशिश करें की जब हमारे निर्जीव शरीर में परम आत्मा अपना कुछ अंश हमारी आत्मा के रूप में प्रविष्ट करवाती है जिससे हमारे शरीर में चेतना का संचार होता है बस यही तो हमारे मन का जन्म है। चुंकि यह शरीर में अद्व्रशय रूप में रहता है इसलिये इसके आकार में समय के साथ साथ परिवर्तन की आवश्यकता नही होती अतः हमारा मन ही हमारे शरीर एक मात्र का वह भाग हो गया जो जन्म के समय से ही पूर्ण विकसित होता है अतः बचपन से बुढापे तक के सफर में इन्सान का मन समान रहता है इसलिए कहा जाता है कि “ इंसान का मन कभी भी बुढ़ा नही होता है ”
     
      यह हमारे जागने तथा सोने दोनो अवस्थाओं में निरन्तर कार्य करता रहता है जब हम जाग रहे होते है तो घर-परिवार, इधर-उधर, भूत-भविष्य में लगा रहता हैं और जब हमारा शरीर सोता है तब हमारा मन सपनों या कल्पनाओं में खो कर पता नही कहां कहां विचरता रहता है। अतः यदि हम हमारे मन को दिव्य शक्ति या परम शक्ति (सुपर-पॉवर) भी कह दें तो गलत नही होगा।
    
      मन के बारे में और भी अनेक जरूरी बातें मैं यहां लिखना चाहता हूँ लेकिन कहीं मैं मेरे मन के पूछे मूल प्रश्न, कि क्या मैं चंचल हूँ और क्या मुझे चंचल होना चाहिए ? उससे भटक ना जाऊं इसलिये इसके उत्तर के लिये आगे बढ़ते हुए मुझे मन की गति पर भी घ्यान देना होगा। इस संसार में मौजूद किसी भी गति से अधिक तेज हमारे मन की गति होती है तभी तो जब हम अपने पूर्वजों को याद करते है तो हमारा मन स्वयं जाकर क्षण भर में उनका चित्र हमारे सामने रख कर उनके साक्षात दर्शन भी करा देता है और हमारे आखें बन्द करते ही एक क्षण में अन्तरिक्ष की सैर भी कर आता है ।
      हम अपने मन की तुलना कई प्रकार से कर सकते हैं जैसे यह उस बालक के समान हैं जिस पर छोटा होने के कारण कोई अंकुश नही लगाते, जिससे वह जिद्दी होकर मनमानी करने लगता है दूसरे बच्चों के खिलौने छीन्ने लगता है, अपने खिलौनों पर किसी को हाथ नही लगाने देता और माता-पिता, दादा-दादी पर केवल अपना ही अधिकार समझता हैं।
    
      आज के परिवेश में मन की तुलना करना चाहें तो यह उस अधिकारी के समान हैं जो अपने मातहत् कर्मचारियों को विभिन्न काम में लगा कर जब काम होने लगता है तो स्वयं वहां से कहीं ओर चला जाता है और अपने कार्य में वयस्त हो जाता है।
   
      इस अधिकारी के समान हमारा चंचल मन भी विभिन्न कल्पनायें , योजनाएं बनाता है और उसे शरीर की विभिन्न इन्द्रियों से पूरी ताकत लगाकर साकार करवाने में लग जाता है। जब तक वह साकार नही हो जाती मन को तृप्ति नही मिलती है और साकार होते ही मन उससे ऊब कर नई कल्पना बनाकर कहीं ओर भटकने लगता है। अर्थात हमारा मन कल्पनाओं का आदि हो गया है। जो कभी सन्तुष्ट नही होता इसलिए सुखी भी नही हो पाता। सन्तुष्ट  हो जाय तो सुखी हो जाय, कहते भी हैै ना ’’संतोशी सदा सुखी’’।      
    
       जिस प्रकार समंुद्र की कोई सीमा या गहराई नही होती वह विशाल, गहरा और अमर्यादित होता है उसी प्रकार हमारे मन को खुला छोड़ दे तो मन के कल्पना की भी कोई मर्यादा, सीमा या गहराई नही होती। और यह हमारे मन की चंचलता ही तो है जो मन में विभिन्न असीमित, अमर्यादित कल्पनायें बनाकर हमारे जीवन में विभिन्न प्रकार की हलचल मचाती रहती है । मन के यही सभी लक्षण उसकी चंचलता साबित करते है जो कभी भी एक काम से संतुष्ट नही होता है।
    
      चूंकि अभी तक मन की चंचलता लगभग साबित हो चुकी हैं अतः सभ्य समाज में रहने के कारण उसे नियंत्रित कर सही दिशा में आगे बढ़ाकर जीवन का आनन्द लेने के उपाय भी चर्चा करना आवश्यक हो जाता है ।
     
       ईश्वर ने प्रत्येक प्राणी को समान मन देकर पृथ्वी पर भेजा है सभी केे मन में विकास और विनाश दोनो तरह की कल्पनाऐं बनती रहती हैं यदि हम हमारे मन पर नाजायज कब्जा जमाये बैठे बुरे किरायेदारों (क्र्रोध, कामवासना, लालच, ईर्ष्या, अंहकार , द्वैष आदि) से मन को खाली करवा कर उसमें अच्छे किरायेदारों (सदगुण, सेवाभाव, ज्ञान, परोपकार आदि) को रखने में कामयाब हो जाते हैं तो हम योगी बन जाते है। और जीवन का सही आनंद उठा पाते हैं अन्यथा भोगी या साधारण मनुष्य बनकर अपना जीवन नर्क बना लेते हैं। इसके लिये जैसे जैसे हम ईश्वर भक्ति द्वारा सदगुणों को बढाते जायेंगे मन के बुरे किरायेदारों का दम घुटने लगेगा और मजबूर होकर उन्हें मनरूपी मकान खाली करके जाना ही पड़ेगा जिससे हमारा मन निर्मल बनता जायेगा।
     
       हम मर्यादा में रहकर ईश्वर भक्ति, ब्रह्म ज्ञान व योग का सहारा लेकर यदि अपने मन को नियन्त्रित करने का प्रयास करेंगे तथा अपने अन्तर मन में झांक कर उसे पढ़ने की कोशिश करेंगे तो हमारे आत्म ज्ञान में वृद्धि होगी और हमारे मन कि चंचलता { भटकना} नियंत्रित होगी जिससे मन स्वयं हमारे व समाज के विकास की दिशा में मुड़ जायेगा। सही दिशा मिलने पर मन के असंतोष से पैदा होने वाली क्रान्ति भी खत्म हो जाती है।
     
      इसी प्रकार मन की चंचलता पर एकाग्रचित होकर भी अंकुश लगाया जा सकता है। जिस प्रकार हम अपने पंसदीदा कार्यक्रम को टीवी में देखते समय अपना पूरा ध्यान उस तरफ लगा लेते हैं अर्थात मन से उससे जुड़ जाते हैं तो पूर्ण आनन्द प्राप्त होता है उसी प्रकार निर्णय लेते समय हम मन के साथ-साथ बुद्धि और परिणाम का ध्यान पूरे एकाग्रचित होकर लगायेंगे तो अन्तर मन की गवाही हमें सही मार्ग पर चलने की राह दिखायेगी और सदैव चंचलता पर अंकुश लगाने में सफलता ही हासिल होगी।
      मेरी इस बात से तो आप सहमत ही होगें कि हम किसी अन्य व्यक्ति के मन में चल रहे विचार व उसकी मनः स्थिति के बारें में मात्र कयास ही लगा सकते हैं कि उसके मन में क्या चल रहा है। लेकिन हम अपने आप के मन को तो सबसे बेहतर तरीके से जानते ही हैं कि हम क्या हासिल करना चाहते हैं चंूकि विचार हमारे हैं तो मंजिल भी हमारी ही होगी। अतः सर्व प्रथम हमे अपनी मंजिल का मन के साथ साथ बुद्धि लगाकर निधार्रण करना होगा। और आकलन करना होगा कि हमारे मन ने जो कार्य इन्द्रियों को करने के लिए दिया है वह सही है या नही ? इसे ही बोल-चाल की भाषा में हम “मन की गवाही देना ” भी कह सकते हैं।
      जिस प्रकार क्र्रिकेट मैच प्रारम्भ होने से पूर्व अम्पायर सिक्का उछाल कर प्रथम निर्णय लेेने का अधिकार सुनिश्चित करता है उसी प्रकार यदि हम भी कभी अपने दोनो मन की लड़ाई में घिर जायें और अनिश्चितता, अनिर्णय की स्थिति में आ जायें तो हमें भी दोनो मन के बीच सिक्का उछाल कर मन की गवाही से ही निर्णय लेना चाहिये। अर्थात हमें अपने चंचल मन की कल्पनाओं-इच्छाओं को बुद्धि रूपी छलनी से छानना होगा क्योंकि मन जब बुद्धि के साथ मिलकर काम करेगा तो ही हमारे ” मन की गवाही का जन्म ” होगा।
   हमको मालूम होना चाहिये कि हमारा मन सभी इन्द्रियों को बस में कर स्वयं उनका राजा बन गया है। हमें अपनी इन्द्रियों को उसके पॉश से छुड़ाने के लिए राजा रूपी मन को ही वश में करने का अभ्यास करना होगा। जो कि अत्यन्त कठिन कार्य जरुर है लेकिन असम्भव बिलकुल नही है। मन को वश में करने से मेरा तात्पर्य यह नही है कि आप कल्पना करना ही छोड़ दें इससे तो मन जड़ रूप हो जायेगा और हमारी आत्मा शरीर छोड़ कर चली जायेगी जिससे हमारा अस्तित्व ही खत्म हो जायेगा। हमें तो मात्र अपने मन को शान्त, एकाग्रचित बनाने का अभ्यास करना है जिससे वो सार्थक कल्पनाऐं करे और सदमार्ग पर ही चलें।
      
        इस अभ्यास को करने के लिए जब-जब हमारा मन कोई गलत मार्ग चुने तो हमारी बाकी इन्द्रियों से उसे असहयोग करवाना होगा। जैसे- हमें कोई वस्तु खाने की इच्छा हुई और हमारे मस्तिष्क के आदेश देने पर हाथ ने वो वस्तु उठाकर मुँह में डाली तभी तो हम उसे खा पाये। यदि हमारा हाथ वस्तु उठाकर मुँह में नही डालता तो हम उस वस्तु को नही खा सकते थे इसी प्रकार कामवासना झूठ, लालच, अपराध आदि कार्यों की इच्छा होने पर हम अपनी इन्द्रियों पर काबू करने का अभ्यास करके अपने बुरे मन से असहयोग करेें तो हमसे वह कार्य नही हो पायेंगें और हम भोगी व अत्याचारी होने से बच पायेंगे जिससे हमारा मन धीरे-धीरे विशाल और सच्चा बनने लगेगा और उसमें ईश्वर का वास होने लगेगा।       
      
       जैसे जैसे हम अपनी कल्पनाओं-इच्छाओं पर नियंन्त्रण करने में कामयाब होते जाते है वैसे वैसे हमें सुख-दुख, अमीरी-गरीबी, भेद-भाव, ऊँच-नीच, मान-अपमान आदि का अन्तर कम महसुस होने लगता है और हम शान्त व सन्तुष्ट होने लगते हैं। अर्थात हमारी आत्मा परमात्मा की तरफ कदम बढाने लगती है। जिसे देव पुरूष बनना भी कह सकते हैं।

       अभी तक मेरेे मन में आये विचारों के अनुसार मेरी निजी राय यही बनी है कि मन का चंचल होना अति आवश्यक है क्योंकि इन्सान कल्पनाओं को मूर्तरूप देकर ही विकास कर सकता है। कल्पना विहीन मानव का जीवन अभिशाप बन कर रह जायेगा , विकास ठहर सा जायेगा। हमारा मन हमारा शत्रु नही है बस उसे अपनी मन मर्जी करने से रोकने की आवश्यकता है हम अभ्यास और भौतिक वस्तुओं से वैराग्य भाव बढ़ाकर मन को मर्यादा में बांध सकते हैं अन्यथा जैसे - जैसे मन की इच्छाओं को पूर्ण करते जायेंगे वैसे-वैसे इच्छायें बढ़ती ही जायेगी, इसका कोई अन्त नही है। हमारा उद्वेश्य बस मर्यादा पूर्वक एकाग्रचित व शान्त भाव से सन्तुष्ट रहने की साधना करके आत्मा को परमात्मा में लीन करना होना चाहिये ।
 अन्त में कहना चाहूँगा कि मन चंचल है और होना भी चाहिए बस इसे समझने की जरूरत है। आपका क्या उत्तर है मुझे बता सकें तो शुक्र्र्र्रिया लेकिन अपने मन को जरूर बता दें कि आप क्या सोचते हैं ?