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Thursday, April 04, 2013

अभिलाषा

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 प्रत्येक माता पिता की यह अभिलाषा रहती है। कि उनकी संतान उनसे अधिक सम्पन्न, प्रतिष्ठित व उच्च पद प्राप्त करे। जिस प्रकार शिष्य के यश प्राप्ति का श्रेय गुरू को मिलता है उसी प्रकार माता पिता भी अपने अधुरे सपने को अपनी सन्तान में पूर्ण होते देख उसे अपनी ही सफलता मानते हैं ।
 लेकिन क्या सन्तान के लक्ष्य प्राप्त करने के लिए माता पिता ने अपना कर्तव्य पूर्ण रूप से निभाया है या आज निभा पा रहे हैं ?
 जिस प्रकार हमारी आत्मा अपने दोनों स्वरूपों शरीर एवं मन के बीच सही सामन्जस्य बिठाकर जीवन नैया को आगे बढ़ाती है उसी प्रकार हमारा भी कर्तव्य है कि हम अपनी सन्तान के सफल जीवनयापन के लिए सर्व प्रथम उसकी क्षमता, इच्छा व साधन सुविधा का आकलन करते हुए लक्ष्य निर्धारण करने में मदद करें। इस समय हमारी निष्पक्षता ही सन्तान की इच्छाओं का सही ध्यान रख पायेगी। तथा एक बार निर्धारित लक्ष्य को आज की भौतिकतावादी परिस्थितियों में ताल मेल बैठाते हुए उसे हासिल करने की क्षमता विकसित करने में आने वाली बाधाओं को दूर करते हुए उसका मार्गदर्शन करें।
क्या हम ऐसा कर पा रहे हैं ? या फिर अपने ज्ञान और अनुभव के दम्भ में सन्तान पर अपने विचार व स्वप्न थोप रहे हैं ।
दरअसल संतान के बाल मन से जवान होने तक हम अपने अधूरे सपने को बार बार याद दिलाकर उसके मन में इतना गहरा बैठा देते हैं कि संतान को भी वह सपना उसका अपना लगने लगता है और वह उसे हासिल करने को अपने माता पिता की खुशी के साथ जोड़ कर देखने लगता है ।
अर्थात वह डॉक्टर, इजीनियर, सरकारी नौकर बन कर अपने कैरियर की शुरूआत कर देता है, लेकिन जैसे जैसे वह वयस्क होेता है उसके मन में स्वयं के सपने जैसे लेखक, कलाकार बनना या व्यापार करना आदि पनपने लगते हैं ।
उसका मन बैचेन होने लगता है कि मैं डॉक्टर या इंजीनियर हूंँ अब यदि व्यापार करूंगा या कला के क्षेत्र में जाउंगा तो सभी मुझे मूर्ख कहेगें तथा हसेगें अर्थात वह लीक से हट कर कार्य करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है । उसकी डिग्री इस कार्य में बाधा उत्पन्न करती है जिससे उसके मन में एक कुण्ठा पनपने लगती है तथा वह अपने वर्तमान कार्य को पूर्ण रूचि से ना करते हुए मात्र आजीविका समझ कर ढ़ोने लगता है ।वह मनुष्य जीवन के सबसे बडे कर्म भाग को अनिच्छा से अपनी भावनाओं के साथ समझौता करके जीने लगता है ।
इसी बात को दूसरे शब्दो में कहें तो क्या हमारे द्वारा लिए एक गलत निर्णय को सही ठहराने के लिए हमने अपनी सन्तान को जीवन पर्यन्त गलत निर्णय लेने के लिए बाध्य नही कर दिया ?
यदि खुले मन से स्वीकारें तो मध्यम वर्गीय समाज में पचास प्रतिशत {50} से अधिक अभिवावक इससे सहमत होंगे। जीवन के इस असमंजस में जीते जीते एक दिन सन्तान स्वयं अभिवावक बन जाती है और जाने अनजाने अपने साथ हुई गल्ती को बिना सुधारे अपने अधुरे सपने अपनी सन्तान से पूर्ण कराने की इच्छा रखती है अर्थात यह गलती पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है ।
क्या हमें इसे यहीं रोक कर सुधार नहीं करना चाहिए ? इस प्रशन के उत्तर की प्रतिशतता यहां नहीं बतलायी जा सकती, क्योंकि यह भविष्य काल का प्रशन है जो हमारे आने वाले समय के विचारों पर निर्भर करता है, लेकिन इस पर हमें ध्यान जरूर देना चाहिए ।
अब हमारे दिमाग में यह तर्क आना स्वाभाविक है कि संतान अपरिपक्व होने के कारण सही और गलत का ज्ञान नहीं कर पायेगी इससे वह सही लक्ष्य कैसे बना पायेगी। एवं हम व्यस्क और अनुभवी होने के कारण उसका लक्ष्य अच्छे प्रकार से निर्धारित कर सकते हैं । कुछ मायनों तक मन में उपजा यह तर्क प्रासंगिक भी है लेकिन क्या इन दोनो अवस्थाओं के बीच कोई विकल्प नही है। यदि हम सोचेंगे तो अनेक विकल्प मिल सकते हैं जिसमें से एक विकल्प यह है जिसे चाहें तो हम अपना सकते हैं क्यों ना संतान की    शिक्षा के मध्य भाग में जब उसके लक्ष्य निर्धारित करने का समय आये उस समय हम उसे सभी विकल्पों के लाभ हानि, व्यस्तता व अन्य पहलुओं को समझायंे तथा उसमें से उसका मन किसे हासिल करना चाहता है यह जनाने का प्रयत्न करंे जिससे जीवन में उसे कभी कार्य व इच्छा के दोराहे पर खड़ा ना होना पड़े । हमें ध्यान रखना होगा कि यदि हमारी संतान पारम्परिक कार्यो से हटकर कुछ नया करना चाहती है तो हम अनजाने भय से डरकर बिना सोचे समझे उसके विरोध में खडे़ ना हो जाएं।
अभी समय है हमें इस कटू सत्य को स्वीकार कर सच्चाई के साथ इसे मिटाने की दिशा में कदम बढ़ाना होगा।