इंसान जीवन में जो पाना चाहे वह नही मिले या किसी से अपेक्षा करे और वह पुरी नही हो तो कष्ट का अहसास होता है। या किसी से अत्यघिक लगाव भी हमारे कष्ट का मुख्य कारण होता है।आज किसी बात पर धर्मपत्नि से मनमुटाव होने पर मैं खामोश हो गया। इस खामोशी ने मुझे कष्ट का अहसास करा दिया और मैं मन ही मन एनालिसिस करने लगा कि हमें निराशावादी बनाने वाला ये कष्ट है क्या ? कहां से आया ? क्या मैं अकेला हूँ जिसे कष्ट है। मैने आँखें मूंद कर अपने आस पास के माहौल पर मन की दृष्टि डाली तो देखा कि यह तो आम बात है। आज प्रत्येक इंसान को दुसरे से कष्ट है। लगता है कि इस संसार में सभी को किसी ना किसी बात पर कष्ट है। जहां तक मैं सोच पाया उसके अनुसार इंसान जीवन में जो पाना चाहे वह नही मिले या किसी से अपेक्षा करे और वह पुरी नही हो तो कष्ट का अहसास होता है। या किसी से अत्यघिक लगाव भी हमारे कष्ट का मुख्य कारण होता है। अब सवाल ये आता है कि यह आया कहां से ? इसके लिये मैं वापस अपने अतीत पर चला जाता हूँ। जब मेरे जीवन में धर्मपत्नि नही थी तब क्या मुझे कष्ट नही था ? लेकिन वास्तव में ऐसा नही है उस समय तो धर्मपत्नि नही होना ही मेरा सबसे बड़ा कष्ट था। आज हमें अपने रोजगार से कष्ट है लेकिन यह रोजगार जब हमारे पास नही था तो हमें सबसे ज्यादा कष्ट इसके नही होने का ही था। यही बात हमारे रिश्तों और अन्य सभी बातों पर लागू होती है। और तो और विभिन्न प्रयत्न और नित्य ईश्वर की प्रार्थना करके प्राप्त की गई हमारी प्रिय संतानों से भी आज हमें कष्ट क्यों महसूस हो रहा है ? अरे मुझे ऐसा क्यों लगने लगा कि मैं शब्दों के मायाजाल में उलझ गया हूँ। देखिये मुझे शाब्दिक मायाजाल में उलझने का ही कष्ट होने लगा है। लेकिन मेरी इस बात से तो आपको सहमत होना ही पड़ेगा कि हमारी नित नई इच्छाएं और बढ़ती महत्वाकांक्षाएँ ही आकार में बडी होेकर पूर्णता के फल में बदलती हैं और जैसे जैसे हम उनके पूर्ण होने का फल खाते रहते हैं हमारे पास उस फल से निकलने वाले कष्ट के बीज इकट्टठे होने लगते हैं और जब इन्ही कष्ट रूपी बीजों को अनुकूल वातावरण मिलता है तो ये पनपने लगते हैं। बस फिर क्या जैसे जैसे ये पौधे बडे़ होने लगेंगे वैसे वैसे हमारा कष्ट भी बढ़ता जायेगा। कहीं आप ये तो नही सोचने लगे की मैं आपको इच्छाएं और महत्वाकांक्षाए नही रखने की सलाह दे रहा हूँ। ऐसा नही है सफल और जीवंत जीवन जीने के लिए यह सब जरूरी है। बस आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी सोच और महत्वाकांक्षाओं में तालमेल बैठा कर इन कष्ट रूपी पौघों को पनपने ही ना दें। आप यह अच्छी तरह से समझ लें कि कार्य और रिश्तो से आप बच नही सकते तो फिर उन्हें ढोने से अच्छा हैे कि उन्हें जी भर कर जियें । बात करते करते अब मुझे लगने लगा है यदि मैने अपनी बात को और आगे बढाया तो आपको कही पढने में कष्ट ना होने लगे इसलिए अन्त में कहना चाहूँगा कि आज के किसी कष्ट का निवारण ही कल हमारे नये कष्ट के जन्म का कारण होगा । कष्ट केवल महसूस किया जाता है। वास्तव में नहीं होता।
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Sunday, March 18, 2012
कष्ट
Tuesday, December 27, 2011
अलविदा 2011
अलविदा 2011
अलविदा बीते वर्ष, अलविदा !
चले जाओ तुम भी रूठ कर !
मेरे अपने अरमानों को कुचल कर !
कितनी आषाएँ थी कितनी उम्मीदें थी !
चले जाओ तुम सब रौंद कर !
मन बुझा है तुम्हें क्या ?
दिल टुटा है तुम्हें क्या ?
तुम तो मन भर जिये हो ना
मेरी पीर का तुम्हें क्या ?
तुम तो खुष हो ना ?
सत्य र्साइं का साथ छुडाकर !
वैष्विक मंदी फैलाकर !
नित नये घोटाले कर !
सात अरब जन संख्या बनाकर !
फिर भी विदाई तो तुम्हें देनी ही होगी !
औपचारिक पार्टी में धन्यवाद तो देना ही है !
तुमने कुछ अच्छा जो किया है !
गरीब को खाद्य सुरक्षा का आष्वासन दिलाकर !
उपवासांे का महत्व समझा कर !
तिहाड़ का मान बढाकर !
अग्नि, पृथ्वी और अस्त्र दिलाकर !
Friday, December 23, 2011
Chitransh soul: चंचल मन
Chitransh soul: चंचल मन: जिस प्रकार समंुद्र की कोई सीमा या गहराई नही होती वह विशाल, गहरा और अमर्यादित होता है उसी प्रकार हमारे मन को खुला छोड़ दे तो मन के कल्पना की भ...
Chitransh soul: क्रिसमस
Chitransh soul: क्रिसमस: यदि आप क्रिसमस की पूर्व संध्या पर बच्चों को गिट देने के लिये चाबी वाले खिलौने, स्टार, गुड़ियाएँ, गुल्लक, टाफियॉ और अन्य उपहार खरीद रहे हैं त...
क्रिसमस
यदि आप क्रिसमस की पूर्व संध्या पर बच्चों को गिट देने के लिये चाबी वाले खिलौने, स्टार, गुड़ियाएँ, गुल्लक, टाफियॉ और अन्य उपहार खरीद रहे हैं तो खरीदते समय बच्चों की पसंद का घ्यान जरूर रखें अन्यथा षायद बच्चों को आपका दिया उपहार पसंद ही ना आयें और आप निराष हो जायें । आजकल बाजार में आकर्षक और सस्ते विदेषी खिलौने ने बच्चों का घ्यान आकर्षित कर रखा है। इस लिये आपके खरीदे पारंपरिक खिलौने या चाबी वाले खिलौनो की जगह उन्हें कम्प्यूटराइज्ड गेम या रिमोट वाले गिट ही पसन्द आयेंगे। जिससे वो अपने साथियों पर रौब जमा सकें। आज बच्चे कार्टून या पावर रेंजर देखते देखते अपने आप को उनसे जोड़ने लगे हैं और पिस्तौल, टैंक या स्टेनगन वाले खिलौने हासिल करके उन जैसा बनना चाहते हैं। इसी प्रकार जब से विदेषी ब्राउन चॅाकलेट या कॉफी चॅाकलेट बाजारों में आसानी से उपलब्ध होने लगी हैे साघारण टाफियाँ तो मानो बच्चों का स्टैण्डर्ड कम कर रही है। कहीं ऐसा ना हो कि आपका गिट बांटने का उत्साह ही ठंडा हो जायें। इसलिये आजकल के हाई प्रोफाइल बच्चों की पसंद का घ्यान जरूर रखें। लेकिन अपने अनुभव का फायदा उठाते हुए यह कोषिष करें कि जो भी गिट दें उससे बच्चों को आगे बढ़ने को मौका मिले उससे वह कुछ नया सिखें।
Thursday, December 22, 2011
चंचल मन
जिस प्रकार समंुद्र की कोई सीमा या गहराई नही होती वह विशाल, गहरा और अमर्यादित होता है उसी प्रकार हमारे मन को खुला छोड़ दे तो मन के कल्पना की भी कोई मर्यादा, सीमा या गहराई नही होती।
खुशनुमा मौसम, अवकाश का दिन...........चिड़ियाओं की चहकने की संगीत लहरियां......... शहर के बगीचें में बैठा प्रकृति का आनन्द उठा रहा हूँ..........हाथ की कलम मन के उद्गारों को कागज पर उकेरने के लिए बेताब......... प्रफुल्लित चंचल मन इधर-उधर भटक कर सामने पेड़ों पर अटक गया..........एक बन्दर इस टहनी से उस टहनी, इस पेड़ से उस पेड़ पर उछल रहा है। यदि किसी टहनी पर रूक भी जाता है तो बैठा- बैठा तरह तरह की हरकतें करने लगता है। उसको देखकर मुझे लगा कि एक बन्दर मेरे अंदर भी तो है “ मन रूपी बन्दर “। वो भी तो कभी एक जगह नही टिकता है हमेशा विभिन्न क्रिया कलापों में या ऐसी कल्पनाओं में खोया रहता है जिनकी ना तो कोई दिशा होती है। और ना ही अस्तित्व होता है बस सदैव चंचल और चलायमान बना रहता हैं।
लेकिन शायद मेरे मन को अपनी तुलना बन्दर से करना अच्छा नही लगा और उसने पलट कर स्वयं मेरे से ही प्रश्न पूँछ लिया कि क्या मैं चंचल हूॅ ? और यदि हूँ भी तो क्या मुझे चंचल नही होना चाहिए ? उसके प्रश्न ने मुझे सोच में डाल दिया मैं विभिन्न उत्तर और उनके कटाक्ष सोचने लगा। लेकिन मैं अपने किसी उत्तर से सन्तुष्ट नही हो पाया इसलिए इस प्रश्न को मैने आप से साझा करने का निर्णय लिया । अब मैं अपने मन में आये विभिन्न विचारो को आपके समक्ष रख रहा हूँ । आप ही सही निर्णय करके बताएं और अपने-अपने मन को भी समझा दें।
हमारा मन ( संस्कृत में मनस ) शरीर का वह भाग है जिसमें हमारे विचार उत्पन्न होते है, विज्ञान हमारे मन कि तीन अवस्थायें (चेतन, अर्द्धचेतन, अचेतन) बताता है । इसमे से मन का मात्र दस प्रतिशत हिस्से चेतन मन से हम अपने दैनिक क्रिया कलाप करते है, शेष 90 प्रतिषत हिस्सा अचेतन मन हमारा कल्पना लोक होता है और हमारे याद करने, निर्णय लेने या अपनी ईच्छा-अनिच्छा आदि दिखाने के समय हमारे मन की अर्द्ध चेतन अवस्था काम आती है। इसके अलावा हमारे मन की अनगिनत दशायें जिन्हें हम प्रति क्षण महसूस करते है जैसे - स्नेह, दया, ममता, त्याग, विश्वास, आत्मसर्मपण, श्रद्धा, संवेदना, कामवासना, मोह, वात्सल्य, कौतूहल, ईर्ष्या, द्वेष, करूणा, गुस्सा, जिज्ञासा, आशा, निराशा आदि।
अब आगे बढने से पहले हमारे सामने यह प्रशन आता है कि इस मन का जन्म हमारे शरीर में होता कब है ? इसको ऐसे समझने की कोशिश करें की जब हमारे निर्जीव शरीर में परम आत्मा अपना कुछ अंश हमारी आत्मा के रूप में प्रविष्ट करवाती है जिससे हमारे शरीर में चेतना का संचार होता है बस यही तो हमारे मन का जन्म है। चुंकि यह शरीर में अद्व्रशय रूप में रहता है इसलिये इसके आकार में समय के साथ साथ परिवर्तन की आवश्यकता नही होती अतः हमारा मन ही हमारे शरीर एक मात्र का वह भाग हो गया जो जन्म के समय से ही पूर्ण विकसित होता है अतः बचपन से बुढापे तक के सफर में इन्सान का मन समान रहता है इसलिए कहा जाता है कि “ इंसान का मन कभी भी बुढ़ा नही होता है ”
यह हमारे जागने तथा सोने दोनो अवस्थाओं में निरन्तर कार्य करता रहता है जब हम जाग रहे होते है तो घर-परिवार, इधर-उधर, भूत-भविष्य में लगा रहता हैं और जब हमारा शरीर सोता है तब हमारा मन सपनों या कल्पनाओं में खो कर पता नही कहां कहां विचरता रहता है। अतः यदि हम हमारे मन को दिव्य शक्ति या परम शक्ति (सुपर-पॉवर) भी कह दें तो गलत नही होगा।
मन के बारे में और भी अनेक जरूरी बातें मैं यहां लिखना चाहता हूँ लेकिन कहीं मैं मेरे मन के पूछे मूल प्रश्न, कि क्या मैं चंचल हूँ और क्या मुझे चंचल होना चाहिए ? उससे भटक ना जाऊं इसलिये इसके उत्तर के लिये आगे बढ़ते हुए मुझे मन की गति पर भी घ्यान देना होगा। इस संसार में मौजूद किसी भी गति से अधिक तेज हमारे मन की गति होती है तभी तो जब हम अपने पूर्वजों को याद करते है तो हमारा मन स्वयं जाकर क्षण भर में उनका चित्र हमारे सामने रख कर उनके साक्षात दर्शन भी करा देता है और हमारे आखें बन्द करते ही एक क्षण में अन्तरिक्ष की सैर भी कर आता है ।
हम अपने मन की तुलना कई प्रकार से कर सकते हैं जैसे यह उस बालक के समान हैं जिस पर छोटा होने के कारण कोई अंकुश नही लगाते, जिससे वह जिद्दी होकर मनमानी करने लगता है दूसरे बच्चों के खिलौने छीन्ने लगता है, अपने खिलौनों पर किसी को हाथ नही लगाने देता और माता-पिता, दादा-दादी पर केवल अपना ही अधिकार समझता हैं।
आज के परिवेश में मन की तुलना करना चाहें तो यह उस अधिकारी के समान हैं जो अपने मातहत् कर्मचारियों को विभिन्न काम में लगा कर जब काम होने लगता है तो स्वयं वहां से कहीं ओर चला जाता है और अपने कार्य में वयस्त हो जाता है।
इस अधिकारी के समान हमारा चंचल मन भी विभिन्न कल्पनायें , योजनाएं बनाता है और उसे शरीर की विभिन्न इन्द्रियों से पूरी ताकत लगाकर साकार करवाने में लग जाता है। जब तक वह साकार नही हो जाती मन को तृप्ति नही मिलती है और साकार होते ही मन उससे ऊब कर नई कल्पना बनाकर कहीं ओर भटकने लगता है। अर्थात हमारा मन कल्पनाओं का आदि हो गया है। जो कभी सन्तुष्ट नही होता इसलिए सुखी भी नही हो पाता। सन्तुष्ट हो जाय तो सुखी हो जाय, कहते भी हैै ना ’’संतोशी सदा सुखी’’।
जिस प्रकार समंुद्र की कोई सीमा या गहराई नही होती वह विशाल, गहरा और अमर्यादित होता है उसी प्रकार हमारे मन को खुला छोड़ दे तो मन के कल्पना की भी कोई मर्यादा, सीमा या गहराई नही होती। और यह हमारे मन की चंचलता ही तो है जो मन में विभिन्न असीमित, अमर्यादित कल्पनायें बनाकर हमारे जीवन में विभिन्न प्रकार की हलचल मचाती रहती है । मन के यही सभी लक्षण उसकी चंचलता साबित करते है जो कभी भी एक काम से संतुष्ट नही होता है।
चूंकि अभी तक मन की चंचलता लगभग साबित हो चुकी हैं अतः सभ्य समाज में रहने के कारण उसे नियंत्रित कर सही दिशा में आगे बढ़ाकर जीवन का आनन्द लेने के उपाय भी चर्चा करना आवश्यक हो जाता है ।
ईश्वर ने प्रत्येक प्राणी को समान मन देकर पृथ्वी पर भेजा है सभी केे मन में विकास और विनाश दोनो तरह की कल्पनाऐं बनती रहती हैं यदि हम हमारे मन पर नाजायज कब्जा जमाये बैठे बुरे किरायेदारों (क्र्रोध, कामवासना, लालच, ईर्ष्या, अंहकार , द्वैष आदि) से मन को खाली करवा कर उसमें अच्छे किरायेदारों (सदगुण, सेवाभाव, ज्ञान, परोपकार आदि) को रखने में कामयाब हो जाते हैं तो हम योगी बन जाते है। और जीवन का सही आनंद उठा पाते हैं अन्यथा भोगी या साधारण मनुष्य बनकर अपना जीवन नर्क बना लेते हैं। इसके लिये जैसे जैसे हम ईश्वर भक्ति द्वारा सदगुणों को बढाते जायेंगे मन के बुरे किरायेदारों का दम घुटने लगेगा और मजबूर होकर उन्हें मनरूपी मकान खाली करके जाना ही पड़ेगा जिससे हमारा मन निर्मल बनता जायेगा।
हम मर्यादा में रहकर ईश्वर भक्ति, ब्रह्म ज्ञान व योग का सहारा लेकर यदि अपने मन को नियन्त्रित करने का प्रयास करेंगे तथा अपने अन्तर मन में झांक कर उसे पढ़ने की कोशिश करेंगे तो हमारे आत्म ज्ञान में वृद्धि होगी और हमारे मन कि चंचलता { भटकना} नियंत्रित होगी जिससे मन स्वयं हमारे व समाज के विकास की दिशा में मुड़ जायेगा। सही दिशा मिलने पर मन के असंतोष से पैदा होने वाली क्रान्ति भी खत्म हो जाती है।
इसी प्रकार मन की चंचलता पर एकाग्रचित होकर भी अंकुश लगाया जा सकता है। जिस प्रकार हम अपने पंसदीदा कार्यक्रम को टीवी में देखते समय अपना पूरा ध्यान उस तरफ लगा लेते हैं अर्थात मन से उससे जुड़ जाते हैं तो पूर्ण आनन्द प्राप्त होता है उसी प्रकार निर्णय लेते समय हम मन के साथ-साथ बुद्धि और परिणाम का ध्यान पूरे एकाग्रचित होकर लगायेंगे तो अन्तर मन की गवाही हमें सही मार्ग पर चलने की राह दिखायेगी और सदैव चंचलता पर अंकुश लगाने में सफलता ही हासिल होगी।
मेरी इस बात से तो आप सहमत ही होगें कि हम किसी अन्य व्यक्ति के मन में चल रहे विचार व उसकी मनः स्थिति के बारें में मात्र कयास ही लगा सकते हैं कि उसके मन में क्या चल रहा है। लेकिन हम अपने आप के मन को तो सबसे बेहतर तरीके से जानते ही हैं कि हम क्या हासिल करना चाहते हैं चंूकि विचार हमारे हैं तो मंजिल भी हमारी ही होगी। अतः सर्व प्रथम हमे अपनी मंजिल का मन के साथ साथ बुद्धि लगाकर निधार्रण करना होगा। और आकलन करना होगा कि हमारे मन ने जो कार्य इन्द्रियों को करने के लिए दिया है वह सही है या नही ? इसे ही बोल-चाल की भाषा में हम “मन की गवाही देना ” भी कह सकते हैं।
जिस प्रकार क्र्रिकेट मैच प्रारम्भ होने से पूर्व अम्पायर सिक्का उछाल कर प्रथम निर्णय लेेने का अधिकार सुनिश्चित करता है उसी प्रकार यदि हम भी कभी अपने दोनो मन की लड़ाई में घिर जायें और अनिश्चितता, अनिर्णय की स्थिति में आ जायें तो हमें भी दोनो मन के बीच सिक्का उछाल कर मन की गवाही से ही निर्णय लेना चाहिये। अर्थात हमें अपने चंचल मन की कल्पनाओं-इच्छाओं को बुद्धि रूपी छलनी से छानना होगा क्योंकि मन जब बुद्धि के साथ मिलकर काम करेगा तो ही हमारे ” मन की गवाही का जन्म ” होगा।
हमको मालूम होना चाहिये कि हमारा मन सभी इन्द्रियों को बस में कर स्वयं उनका राजा बन गया है। हमें अपनी इन्द्रियों को उसके पॉश से छुड़ाने के लिए राजा रूपी मन को ही वश में करने का अभ्यास करना होगा। जो कि अत्यन्त कठिन कार्य जरुर है लेकिन असम्भव बिलकुल नही है। मन को वश में करने से मेरा तात्पर्य यह नही है कि आप कल्पना करना ही छोड़ दें इससे तो मन जड़ रूप हो जायेगा और हमारी आत्मा शरीर छोड़ कर चली जायेगी जिससे हमारा अस्तित्व ही खत्म हो जायेगा। हमें तो मात्र अपने मन को शान्त, एकाग्रचित बनाने का अभ्यास करना है जिससे वो सार्थक कल्पनाऐं करे और सदमार्ग पर ही चलें।
इस अभ्यास को करने के लिए जब-जब हमारा मन कोई गलत मार्ग चुने तो हमारी बाकी इन्द्रियों से उसे असहयोग करवाना होगा। जैसे- हमें कोई वस्तु खाने की इच्छा हुई और हमारे मस्तिष्क के आदेश देने पर हाथ ने वो वस्तु उठाकर मुँह में डाली तभी तो हम उसे खा पाये। यदि हमारा हाथ वस्तु उठाकर मुँह में नही डालता तो हम उस वस्तु को नही खा सकते थे इसी प्रकार कामवासना झूठ, लालच, अपराध आदि कार्यों की इच्छा होने पर हम अपनी इन्द्रियों पर काबू करने का अभ्यास करके अपने बुरे मन से असहयोग करेें तो हमसे वह कार्य नही हो पायेंगें और हम भोगी व अत्याचारी होने से बच पायेंगे जिससे हमारा मन धीरे-धीरे विशाल और सच्चा बनने लगेगा और उसमें ईश्वर का वास होने लगेगा।
जैसे जैसे हम अपनी कल्पनाओं-इच्छाओं पर नियंन्त्रण करने में कामयाब होते जाते है वैसे वैसे हमें सुख-दुख, अमीरी-गरीबी, भेद-भाव, ऊँच-नीच, मान-अपमान आदि का अन्तर कम महसुस होने लगता है और हम शान्त व सन्तुष्ट होने लगते हैं। अर्थात हमारी आत्मा परमात्मा की तरफ कदम बढाने लगती है। जिसे देव पुरूष बनना भी कह सकते हैं।
अभी तक मेरेे मन में आये विचारों के अनुसार मेरी निजी राय यही बनी है कि मन का चंचल होना अति आवश्यक है क्योंकि इन्सान कल्पनाओं को मूर्तरूप देकर ही विकास कर सकता है। कल्पना विहीन मानव का जीवन अभिशाप बन कर रह जायेगा , विकास ठहर सा जायेगा। हमारा मन हमारा शत्रु नही है बस उसे अपनी मन मर्जी करने से रोकने की आवश्यकता है हम अभ्यास और भौतिक वस्तुओं से वैराग्य भाव बढ़ाकर मन को मर्यादा में बांध सकते हैं अन्यथा जैसे - जैसे मन की इच्छाओं को पूर्ण करते जायेंगे वैसे-वैसे इच्छायें बढ़ती ही जायेगी, इसका कोई अन्त नही है। हमारा उद्वेश्य बस मर्यादा पूर्वक एकाग्रचित व शान्त भाव से सन्तुष्ट रहने की साधना करके आत्मा को परमात्मा में लीन करना होना चाहिये ।
अन्त में कहना चाहूँगा कि मन चंचल है और होना भी चाहिए बस इसे समझने की जरूरत है। आपका क्या उत्तर है मुझे बता सकें तो शुक्र्र्र्रिया लेकिन अपने मन को जरूर बता दें कि आप क्या सोचते हैं ?
खुशनुमा मौसम, अवकाश का दिन...........चिड़ियाओं की चहकने की संगीत लहरियां......... शहर के बगीचें में बैठा प्रकृति का आनन्द उठा रहा हूँ..........हाथ की कलम मन के उद्गारों को कागज पर उकेरने के लिए बेताब......... प्रफुल्लित चंचल मन इधर-उधर भटक कर सामने पेड़ों पर अटक गया..........एक बन्दर इस टहनी से उस टहनी, इस पेड़ से उस पेड़ पर उछल रहा है। यदि किसी टहनी पर रूक भी जाता है तो बैठा- बैठा तरह तरह की हरकतें करने लगता है। उसको देखकर मुझे लगा कि एक बन्दर मेरे अंदर भी तो है “ मन रूपी बन्दर “। वो भी तो कभी एक जगह नही टिकता है हमेशा विभिन्न क्रिया कलापों में या ऐसी कल्पनाओं में खोया रहता है जिनकी ना तो कोई दिशा होती है। और ना ही अस्तित्व होता है बस सदैव चंचल और चलायमान बना रहता हैं।
लेकिन शायद मेरे मन को अपनी तुलना बन्दर से करना अच्छा नही लगा और उसने पलट कर स्वयं मेरे से ही प्रश्न पूँछ लिया कि क्या मैं चंचल हूॅ ? और यदि हूँ भी तो क्या मुझे चंचल नही होना चाहिए ? उसके प्रश्न ने मुझे सोच में डाल दिया मैं विभिन्न उत्तर और उनके कटाक्ष सोचने लगा। लेकिन मैं अपने किसी उत्तर से सन्तुष्ट नही हो पाया इसलिए इस प्रश्न को मैने आप से साझा करने का निर्णय लिया । अब मैं अपने मन में आये विभिन्न विचारो को आपके समक्ष रख रहा हूँ । आप ही सही निर्णय करके बताएं और अपने-अपने मन को भी समझा दें।
हमारा मन ( संस्कृत में मनस ) शरीर का वह भाग है जिसमें हमारे विचार उत्पन्न होते है, विज्ञान हमारे मन कि तीन अवस्थायें (चेतन, अर्द्धचेतन, अचेतन) बताता है । इसमे से मन का मात्र दस प्रतिशत हिस्से चेतन मन से हम अपने दैनिक क्रिया कलाप करते है, शेष 90 प्रतिषत हिस्सा अचेतन मन हमारा कल्पना लोक होता है और हमारे याद करने, निर्णय लेने या अपनी ईच्छा-अनिच्छा आदि दिखाने के समय हमारे मन की अर्द्ध चेतन अवस्था काम आती है। इसके अलावा हमारे मन की अनगिनत दशायें जिन्हें हम प्रति क्षण महसूस करते है जैसे - स्नेह, दया, ममता, त्याग, विश्वास, आत्मसर्मपण, श्रद्धा, संवेदना, कामवासना, मोह, वात्सल्य, कौतूहल, ईर्ष्या, द्वेष, करूणा, गुस्सा, जिज्ञासा, आशा, निराशा आदि।
अब आगे बढने से पहले हमारे सामने यह प्रशन आता है कि इस मन का जन्म हमारे शरीर में होता कब है ? इसको ऐसे समझने की कोशिश करें की जब हमारे निर्जीव शरीर में परम आत्मा अपना कुछ अंश हमारी आत्मा के रूप में प्रविष्ट करवाती है जिससे हमारे शरीर में चेतना का संचार होता है बस यही तो हमारे मन का जन्म है। चुंकि यह शरीर में अद्व्रशय रूप में रहता है इसलिये इसके आकार में समय के साथ साथ परिवर्तन की आवश्यकता नही होती अतः हमारा मन ही हमारे शरीर एक मात्र का वह भाग हो गया जो जन्म के समय से ही पूर्ण विकसित होता है अतः बचपन से बुढापे तक के सफर में इन्सान का मन समान रहता है इसलिए कहा जाता है कि “ इंसान का मन कभी भी बुढ़ा नही होता है ”
यह हमारे जागने तथा सोने दोनो अवस्थाओं में निरन्तर कार्य करता रहता है जब हम जाग रहे होते है तो घर-परिवार, इधर-उधर, भूत-भविष्य में लगा रहता हैं और जब हमारा शरीर सोता है तब हमारा मन सपनों या कल्पनाओं में खो कर पता नही कहां कहां विचरता रहता है। अतः यदि हम हमारे मन को दिव्य शक्ति या परम शक्ति (सुपर-पॉवर) भी कह दें तो गलत नही होगा।
मन के बारे में और भी अनेक जरूरी बातें मैं यहां लिखना चाहता हूँ लेकिन कहीं मैं मेरे मन के पूछे मूल प्रश्न, कि क्या मैं चंचल हूँ और क्या मुझे चंचल होना चाहिए ? उससे भटक ना जाऊं इसलिये इसके उत्तर के लिये आगे बढ़ते हुए मुझे मन की गति पर भी घ्यान देना होगा। इस संसार में मौजूद किसी भी गति से अधिक तेज हमारे मन की गति होती है तभी तो जब हम अपने पूर्वजों को याद करते है तो हमारा मन स्वयं जाकर क्षण भर में उनका चित्र हमारे सामने रख कर उनके साक्षात दर्शन भी करा देता है और हमारे आखें बन्द करते ही एक क्षण में अन्तरिक्ष की सैर भी कर आता है ।
हम अपने मन की तुलना कई प्रकार से कर सकते हैं जैसे यह उस बालक के समान हैं जिस पर छोटा होने के कारण कोई अंकुश नही लगाते, जिससे वह जिद्दी होकर मनमानी करने लगता है दूसरे बच्चों के खिलौने छीन्ने लगता है, अपने खिलौनों पर किसी को हाथ नही लगाने देता और माता-पिता, दादा-दादी पर केवल अपना ही अधिकार समझता हैं।
आज के परिवेश में मन की तुलना करना चाहें तो यह उस अधिकारी के समान हैं जो अपने मातहत् कर्मचारियों को विभिन्न काम में लगा कर जब काम होने लगता है तो स्वयं वहां से कहीं ओर चला जाता है और अपने कार्य में वयस्त हो जाता है।
इस अधिकारी के समान हमारा चंचल मन भी विभिन्न कल्पनायें , योजनाएं बनाता है और उसे शरीर की विभिन्न इन्द्रियों से पूरी ताकत लगाकर साकार करवाने में लग जाता है। जब तक वह साकार नही हो जाती मन को तृप्ति नही मिलती है और साकार होते ही मन उससे ऊब कर नई कल्पना बनाकर कहीं ओर भटकने लगता है। अर्थात हमारा मन कल्पनाओं का आदि हो गया है। जो कभी सन्तुष्ट नही होता इसलिए सुखी भी नही हो पाता। सन्तुष्ट हो जाय तो सुखी हो जाय, कहते भी हैै ना ’’संतोशी सदा सुखी’’।
जिस प्रकार समंुद्र की कोई सीमा या गहराई नही होती वह विशाल, गहरा और अमर्यादित होता है उसी प्रकार हमारे मन को खुला छोड़ दे तो मन के कल्पना की भी कोई मर्यादा, सीमा या गहराई नही होती। और यह हमारे मन की चंचलता ही तो है जो मन में विभिन्न असीमित, अमर्यादित कल्पनायें बनाकर हमारे जीवन में विभिन्न प्रकार की हलचल मचाती रहती है । मन के यही सभी लक्षण उसकी चंचलता साबित करते है जो कभी भी एक काम से संतुष्ट नही होता है।
चूंकि अभी तक मन की चंचलता लगभग साबित हो चुकी हैं अतः सभ्य समाज में रहने के कारण उसे नियंत्रित कर सही दिशा में आगे बढ़ाकर जीवन का आनन्द लेने के उपाय भी चर्चा करना आवश्यक हो जाता है ।
ईश्वर ने प्रत्येक प्राणी को समान मन देकर पृथ्वी पर भेजा है सभी केे मन में विकास और विनाश दोनो तरह की कल्पनाऐं बनती रहती हैं यदि हम हमारे मन पर नाजायज कब्जा जमाये बैठे बुरे किरायेदारों (क्र्रोध, कामवासना, लालच, ईर्ष्या, अंहकार , द्वैष आदि) से मन को खाली करवा कर उसमें अच्छे किरायेदारों (सदगुण, सेवाभाव, ज्ञान, परोपकार आदि) को रखने में कामयाब हो जाते हैं तो हम योगी बन जाते है। और जीवन का सही आनंद उठा पाते हैं अन्यथा भोगी या साधारण मनुष्य बनकर अपना जीवन नर्क बना लेते हैं। इसके लिये जैसे जैसे हम ईश्वर भक्ति द्वारा सदगुणों को बढाते जायेंगे मन के बुरे किरायेदारों का दम घुटने लगेगा और मजबूर होकर उन्हें मनरूपी मकान खाली करके जाना ही पड़ेगा जिससे हमारा मन निर्मल बनता जायेगा।
हम मर्यादा में रहकर ईश्वर भक्ति, ब्रह्म ज्ञान व योग का सहारा लेकर यदि अपने मन को नियन्त्रित करने का प्रयास करेंगे तथा अपने अन्तर मन में झांक कर उसे पढ़ने की कोशिश करेंगे तो हमारे आत्म ज्ञान में वृद्धि होगी और हमारे मन कि चंचलता { भटकना} नियंत्रित होगी जिससे मन स्वयं हमारे व समाज के विकास की दिशा में मुड़ जायेगा। सही दिशा मिलने पर मन के असंतोष से पैदा होने वाली क्रान्ति भी खत्म हो जाती है।
इसी प्रकार मन की चंचलता पर एकाग्रचित होकर भी अंकुश लगाया जा सकता है। जिस प्रकार हम अपने पंसदीदा कार्यक्रम को टीवी में देखते समय अपना पूरा ध्यान उस तरफ लगा लेते हैं अर्थात मन से उससे जुड़ जाते हैं तो पूर्ण आनन्द प्राप्त होता है उसी प्रकार निर्णय लेते समय हम मन के साथ-साथ बुद्धि और परिणाम का ध्यान पूरे एकाग्रचित होकर लगायेंगे तो अन्तर मन की गवाही हमें सही मार्ग पर चलने की राह दिखायेगी और सदैव चंचलता पर अंकुश लगाने में सफलता ही हासिल होगी।
मेरी इस बात से तो आप सहमत ही होगें कि हम किसी अन्य व्यक्ति के मन में चल रहे विचार व उसकी मनः स्थिति के बारें में मात्र कयास ही लगा सकते हैं कि उसके मन में क्या चल रहा है। लेकिन हम अपने आप के मन को तो सबसे बेहतर तरीके से जानते ही हैं कि हम क्या हासिल करना चाहते हैं चंूकि विचार हमारे हैं तो मंजिल भी हमारी ही होगी। अतः सर्व प्रथम हमे अपनी मंजिल का मन के साथ साथ बुद्धि लगाकर निधार्रण करना होगा। और आकलन करना होगा कि हमारे मन ने जो कार्य इन्द्रियों को करने के लिए दिया है वह सही है या नही ? इसे ही बोल-चाल की भाषा में हम “मन की गवाही देना ” भी कह सकते हैं।
जिस प्रकार क्र्रिकेट मैच प्रारम्भ होने से पूर्व अम्पायर सिक्का उछाल कर प्रथम निर्णय लेेने का अधिकार सुनिश्चित करता है उसी प्रकार यदि हम भी कभी अपने दोनो मन की लड़ाई में घिर जायें और अनिश्चितता, अनिर्णय की स्थिति में आ जायें तो हमें भी दोनो मन के बीच सिक्का उछाल कर मन की गवाही से ही निर्णय लेना चाहिये। अर्थात हमें अपने चंचल मन की कल्पनाओं-इच्छाओं को बुद्धि रूपी छलनी से छानना होगा क्योंकि मन जब बुद्धि के साथ मिलकर काम करेगा तो ही हमारे ” मन की गवाही का जन्म ” होगा।
हमको मालूम होना चाहिये कि हमारा मन सभी इन्द्रियों को बस में कर स्वयं उनका राजा बन गया है। हमें अपनी इन्द्रियों को उसके पॉश से छुड़ाने के लिए राजा रूपी मन को ही वश में करने का अभ्यास करना होगा। जो कि अत्यन्त कठिन कार्य जरुर है लेकिन असम्भव बिलकुल नही है। मन को वश में करने से मेरा तात्पर्य यह नही है कि आप कल्पना करना ही छोड़ दें इससे तो मन जड़ रूप हो जायेगा और हमारी आत्मा शरीर छोड़ कर चली जायेगी जिससे हमारा अस्तित्व ही खत्म हो जायेगा। हमें तो मात्र अपने मन को शान्त, एकाग्रचित बनाने का अभ्यास करना है जिससे वो सार्थक कल्पनाऐं करे और सदमार्ग पर ही चलें।
इस अभ्यास को करने के लिए जब-जब हमारा मन कोई गलत मार्ग चुने तो हमारी बाकी इन्द्रियों से उसे असहयोग करवाना होगा। जैसे- हमें कोई वस्तु खाने की इच्छा हुई और हमारे मस्तिष्क के आदेश देने पर हाथ ने वो वस्तु उठाकर मुँह में डाली तभी तो हम उसे खा पाये। यदि हमारा हाथ वस्तु उठाकर मुँह में नही डालता तो हम उस वस्तु को नही खा सकते थे इसी प्रकार कामवासना झूठ, लालच, अपराध आदि कार्यों की इच्छा होने पर हम अपनी इन्द्रियों पर काबू करने का अभ्यास करके अपने बुरे मन से असहयोग करेें तो हमसे वह कार्य नही हो पायेंगें और हम भोगी व अत्याचारी होने से बच पायेंगे जिससे हमारा मन धीरे-धीरे विशाल और सच्चा बनने लगेगा और उसमें ईश्वर का वास होने लगेगा।
जैसे जैसे हम अपनी कल्पनाओं-इच्छाओं पर नियंन्त्रण करने में कामयाब होते जाते है वैसे वैसे हमें सुख-दुख, अमीरी-गरीबी, भेद-भाव, ऊँच-नीच, मान-अपमान आदि का अन्तर कम महसुस होने लगता है और हम शान्त व सन्तुष्ट होने लगते हैं। अर्थात हमारी आत्मा परमात्मा की तरफ कदम बढाने लगती है। जिसे देव पुरूष बनना भी कह सकते हैं।
अभी तक मेरेे मन में आये विचारों के अनुसार मेरी निजी राय यही बनी है कि मन का चंचल होना अति आवश्यक है क्योंकि इन्सान कल्पनाओं को मूर्तरूप देकर ही विकास कर सकता है। कल्पना विहीन मानव का जीवन अभिशाप बन कर रह जायेगा , विकास ठहर सा जायेगा। हमारा मन हमारा शत्रु नही है बस उसे अपनी मन मर्जी करने से रोकने की आवश्यकता है हम अभ्यास और भौतिक वस्तुओं से वैराग्य भाव बढ़ाकर मन को मर्यादा में बांध सकते हैं अन्यथा जैसे - जैसे मन की इच्छाओं को पूर्ण करते जायेंगे वैसे-वैसे इच्छायें बढ़ती ही जायेगी, इसका कोई अन्त नही है। हमारा उद्वेश्य बस मर्यादा पूर्वक एकाग्रचित व शान्त भाव से सन्तुष्ट रहने की साधना करके आत्मा को परमात्मा में लीन करना होना चाहिये ।
अन्त में कहना चाहूँगा कि मन चंचल है और होना भी चाहिए बस इसे समझने की जरूरत है। आपका क्या उत्तर है मुझे बता सकें तो शुक्र्र्र्रिया लेकिन अपने मन को जरूर बता दें कि आप क्या सोचते हैं ?
Wednesday, December 14, 2011
क्रिसमस उपहार
बच्चे खुश तो सारा जहाँ खुश। ये ही बात सोच कर मैने भी आने वाली क्रिसमस की पूर्व संध्या पर बच्चों को संता क्लाउॅज की तरह उपहार
देकर खुशी बांटने की सोचा और एक दिन पूर्व ही अपनी जमा पूंजी से ढेर सारे खिलौने { कुछ चाबी वाले, स्टार, गुड़ियाएँ, गुल्लक, टाफियाँ, और अन्य उपहार } जिन्हें में बचपन में खूब पसंद करता था खरीद लिये। एक अच्छी सी संता क्लाउॅज की डैªस भी लाकर रख ली और बेसब्री से क्रिसमस की पूर्व संध्या की इंतजारी करने लगा। 24 दिसम्बर की शाम का अंघेरा होते ही खुशी खुशी तैयार होकर उपहार का झोला लेकर बच्चों को खुशियाँ बांटने निकल पड़ा ।
कुछ ही दूर चला था कि एक सोसाइटी के कम्पाउंड में नई नई डैªसें पहने बच्चे दिख गये । मैं तुरन्त उनके पास पहुँच गया मुझे देखते ही सभी खुश हो गये मुझे लगा जैसे मेरा सपना सच हो गया है। मैने सभी बच्चों को प्यार से दुलार किया और सबसे छोटे बच्चे को सबसे पहले एक चाबी वाला खिलौना निकाल कर दिया । उसने मेरी ओर अचरज से देखा और उस खिलौने में चाबी भर कर जमीन पर चलाया। अभी उसकी चाबी पूरी खत्म भी नही हूई थी कि बच्चे ने उसे उठाते हुए मुझे वापस देकर कहा मुझे ये नही चाहिये मुझे तो कम्प्यूटराइज्ड गेम या रिमोट वाला खिलौना ही चाहिये जिसे दिखा कर मैं अपने स्कूल के साथियों पर रौब जमा सकूं। मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया था क्योकि मैं तो अपने जमाने के खिलौने लाया था अतः मैंे उसकी बात को अनसुना करते हुए तुरन्त बच्चो का घ्यान बाँटने के लिये उन्हें टाफियाँ निकाल कर देने लगा। लेकिन ये क्या ये बच्चे मुझ से टाफियाँ भी नही ले रहे हैं, कारण पुछने पर मालूम चला की इन्हें ये साघारण टाफियाँ पसंद ही नही थी इन्हें तो विदेशी ब्राउन चाकलेट या कॉफी चाकलेट ही पसंद थी।
मैं बातों में उनको उलछा कर बार बार उन्हें टॉफी देने की कोशिश करने लगा । लेकिन आधुनिक बच्चे अब तक समझ चुके थे और मेरे से दूर जाने लगे। बच्चों के मुझ में कम होते आकर्षण को भांप कर मैं भी वहाँ से निकल कर एक साधारण से चाल में खेल रहे बच्चों के पास आ गया। जहाँ मुझे देखते ही सभी बच्चे खुशी से चिल्लाने लगे। मेरी दी हुई टाफियाँ सभी बच्चों सभी ने तुरन्त खा ली और उपहारों के झोले को ललचाई निगाहों से देखने लगे , मैने भी बिना देर लगाये सारा झोला ही उनके सामने खोल दिया। सभी उसमें से पसंद करके खिलौने उठाने लगे लेकिन जल्दी ही उनका उत्साह भी ठंडा पड गया, मैने कारण पता किया तो मालूम चला की आजकल बाजार में आकर्षक और सस्ते चीनी खिलौने आ गये हैं इस लिये मेरे लाये पारंपरिक खिलौने इन्हें पसन्द नही आ रहे हैं। एक छोटे बच्चे को जब मैने एक गुड़िया देनी चाही तो उसने बडे़ अनमने भाव से वह गुड़िया ली। मैने उससे पूछ ही लिया कि पसंद नही आई क्या ? तो उसने कूछ सकुचाते हुए कहा कि मुझे तो पिस्तोल, टैंक या स्टेनगन वाला खिलौना चाहिये था। जिससे मैं अपने साथियों को डरा सकूं ।
मेरे दिल में अब वो उत्साह नही बचा था और मुझे यह बात भी समझ में आ गई थी, की क्यों संता क्लाउॅज रात के अंधेरे में बच्चों को उपहार दे जाते हैं । शायद उन्हें आजकल के हाई प्रोफाइल बच्चों की पसंद मालूम है। मैने भी मन ही मन अगली बार से ऐसे ही मन पसन्द उपहार देने की सोचते हुए घर की ओर प्रस्थान किया।
देकर खुशी बांटने की सोचा और एक दिन पूर्व ही अपनी जमा पूंजी से ढेर सारे खिलौने { कुछ चाबी वाले, स्टार, गुड़ियाएँ, गुल्लक, टाफियाँ, और अन्य उपहार } जिन्हें में बचपन में खूब पसंद करता था खरीद लिये। एक अच्छी सी संता क्लाउॅज की डैªस भी लाकर रख ली और बेसब्री से क्रिसमस की पूर्व संध्या की इंतजारी करने लगा। 24 दिसम्बर की शाम का अंघेरा होते ही खुशी खुशी तैयार होकर उपहार का झोला लेकर बच्चों को खुशियाँ बांटने निकल पड़ा ।
कुछ ही दूर चला था कि एक सोसाइटी के कम्पाउंड में नई नई डैªसें पहने बच्चे दिख गये । मैं तुरन्त उनके पास पहुँच गया मुझे देखते ही सभी खुश हो गये मुझे लगा जैसे मेरा सपना सच हो गया है। मैने सभी बच्चों को प्यार से दुलार किया और सबसे छोटे बच्चे को सबसे पहले एक चाबी वाला खिलौना निकाल कर दिया । उसने मेरी ओर अचरज से देखा और उस खिलौने में चाबी भर कर जमीन पर चलाया। अभी उसकी चाबी पूरी खत्म भी नही हूई थी कि बच्चे ने उसे उठाते हुए मुझे वापस देकर कहा मुझे ये नही चाहिये मुझे तो कम्प्यूटराइज्ड गेम या रिमोट वाला खिलौना ही चाहिये जिसे दिखा कर मैं अपने स्कूल के साथियों पर रौब जमा सकूं। मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया था क्योकि मैं तो अपने जमाने के खिलौने लाया था अतः मैंे उसकी बात को अनसुना करते हुए तुरन्त बच्चो का घ्यान बाँटने के लिये उन्हें टाफियाँ निकाल कर देने लगा। लेकिन ये क्या ये बच्चे मुझ से टाफियाँ भी नही ले रहे हैं, कारण पुछने पर मालूम चला की इन्हें ये साघारण टाफियाँ पसंद ही नही थी इन्हें तो विदेशी ब्राउन चाकलेट या कॉफी चाकलेट ही पसंद थी।
मैं बातों में उनको उलछा कर बार बार उन्हें टॉफी देने की कोशिश करने लगा । लेकिन आधुनिक बच्चे अब तक समझ चुके थे और मेरे से दूर जाने लगे। बच्चों के मुझ में कम होते आकर्षण को भांप कर मैं भी वहाँ से निकल कर एक साधारण से चाल में खेल रहे बच्चों के पास आ गया। जहाँ मुझे देखते ही सभी बच्चे खुशी से चिल्लाने लगे। मेरी दी हुई टाफियाँ सभी बच्चों सभी ने तुरन्त खा ली और उपहारों के झोले को ललचाई निगाहों से देखने लगे , मैने भी बिना देर लगाये सारा झोला ही उनके सामने खोल दिया। सभी उसमें से पसंद करके खिलौने उठाने लगे लेकिन जल्दी ही उनका उत्साह भी ठंडा पड गया, मैने कारण पता किया तो मालूम चला की आजकल बाजार में आकर्षक और सस्ते चीनी खिलौने आ गये हैं इस लिये मेरे लाये पारंपरिक खिलौने इन्हें पसन्द नही आ रहे हैं। एक छोटे बच्चे को जब मैने एक गुड़िया देनी चाही तो उसने बडे़ अनमने भाव से वह गुड़िया ली। मैने उससे पूछ ही लिया कि पसंद नही आई क्या ? तो उसने कूछ सकुचाते हुए कहा कि मुझे तो पिस्तोल, टैंक या स्टेनगन वाला खिलौना चाहिये था। जिससे मैं अपने साथियों को डरा सकूं ।
मेरे दिल में अब वो उत्साह नही बचा था और मुझे यह बात भी समझ में आ गई थी, की क्यों संता क्लाउॅज रात के अंधेरे में बच्चों को उपहार दे जाते हैं । शायद उन्हें आजकल के हाई प्रोफाइल बच्चों की पसंद मालूम है। मैने भी मन ही मन अगली बार से ऐसे ही मन पसन्द उपहार देने की सोचते हुए घर की ओर प्रस्थान किया।
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