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Sunday, May 10, 2015

बड़ा हो गया हूँ

  •  तुम कहती थी ना ,

          कब बड़ा होगा, मेरा लाल,
    लो माँ,आज मैं बड़ा हो गया हूँ ,
         शायद इसीलिए, तुमसे बिछुड़ गया हूँ ,  
    जमाने की भीड़ में खो गया हूँ ,
          लो माँ, आज मैं बड़ा हो गया हूँ ,
  • खो दिया है मैने तुमको,

          अब सुकून कहाँ से आयेगा,
    सर्द रात में हौले से,
          अब कम्बल कौन ओढ़ाएगा,
    बिन मांगे ही सबमें मेरा,
         हिस्सा कौन दिलाएगा,
    बेटा झूँठ नही बोलता,
         मेरा झूँठ कौन छिपायेगा,
    खुलकर हँसता था,तेरे पास,
         अब छिपकर सिसक रहा हूँ ,
    लो माँ,आज मैं बड़ा हो गया हूँ ,
          जमाने की भीड़ में खो गया हूँ ,
  • मेरी छोटी छोटी बातों को,

        कौन, धैर्य से सुन पाएगा,
   पिता की डाँट से,
        अब कौन मुझे बचाएगा,
   देर से सोया था, सोने दो,
        ये सुकून कैसे मिल पाएगा,
   बुरी नजर से बचाने को,
        ललाट पर,चांद कौन बनाएगा,
   होकर भी अनजान हो गया हूँ ,
        लो माँ, आज मैं बड़ा हो गया हूँ ,
   जमाने की भीड़ में खो गया हूँ 
  • कुर्सी तो अब भी पड़ी है माँ

        पर तुम नजर नही आती,
   भोजन तो अब भी, पकता है माँ,
       पर खुशबू क्यूं नही आती,
   आन्टी तो,रोज दिखती है माँ,
       पर वो, अन्जु की माँ, नही पुकारती,
   सफाई वाली तो,अब भी आती है माँ,
       पर देखो ना, पुरानी साड़ी नही मांगती,
   ग्यारस तो अब भी आती है माँ,
       पर मन्दिर कीपुजारिन क्यूं नही आती,
   लिखता तो अब भी हूँ माँ,
       पर कोई गलती नजर नही आती,
   दिखावे के लिए मुस्कुरा रहा हूँ ,
       लो माँ,आज मैं बड़ा हो गया हूँ ,
   जमाने की भीड़ में खो गया हूँ ,

  
           माँ को कलम का समर्पण

          दुर्गा प्रसाद माथुर 10-05-2015

Sunday, March 08, 2015

मुस्कुरा जाती हूँ

ऽ     मुस्कुरा जाती हूँ ,जब तुम,
             अहंकार में भरकर,
      मुझे पुकारते हो अबला ।

ऽ    क्या सिर्फ इसलिए,
           कि, मैं कोमल हूँ ,
     भावनाओं से भरपूर हूँ ,
          या , एक सौम्य दिल रखती हूँ ,
     तुम्हारे अन्जान बंधनों में बंधी हूँ ,
         या , मात्र समर्पण ही दिखला पाती हूँ ,
     या फिर, सभी का हित करती हूँ ,

ऽ    बोलो ना, कैसा आकलन है तुम्हारा ?
         क्या सच में ये आकलन है ?
     या तुम्हारे वजूद का डर है।

ऽ    याद करो , जब जब तुम हारे हो,
         मैने ही जीत दिलायी है।
    जब जब , तुम कमजोर पड़े,
        मैने ही , शक्ति दिखाई है।
    तुम नहीं,
       जगदम्बा ही, दानव का, वध कर पाई है।
    तुम नहीं,
       लक्ष्मी बाई ही, तलवार की, धार दिखा पाई है।
    तुम नहीं,
      सरोजनी ही, कलम से, इतिहास रच पाई है।
    तुम नहीं,
      पन्ना धाय ही, बेटे की, बली चढ़ा पाई है।
    तुम नहीं,
      एक महिला ही , शहीद की माँकहलाई है।

ऽ    काहे तुम इठलाते हो, शायद भूल जाते हो ,
         तुम्हारे शरीर का , एक एक कतरा भी,
     एक महिला ही, बना पाई है।
         इसीलिए, बस मुस्कुरा जाती हूँ ,
    जब तुम, अहंकार में भरकर,

        मुझे पुकारते हो अबला ।

अनजान शक्ति

           
           यह आलेख मेरी धर्म पत्नि के सहयोग से बन पाया है जिसमें एक महिला के मन में उठते सवालों को कलमबद् करने का प्रयास किया गया है दरअसल एक लेखक पुरूष और स्त्री के बन्धन से ऊपर होता है उसकी कलम दिल और मन के संयुक्त होने से ही शब्दों को उकेर पाती है अर्थात वो तो बस एक लेखक होता है
             मैं कौन,बेटी,बहन,बहु,माँ या फिर दादी,नानी । अरे अरे आप अपने दिमाग पर ज्यादा बोझ मत डालिए शायद पहचान नही पायेंगे। और पहचानोगे भी तो कैसे मैं स्वयं अपने आप को नही पहचानती तो फिर आप कैसे पहचान सकते हैं।
            और हाँ शायद एक कारण ये भी है कि मैं दूसरों के लिए कार्य करने ओर सोचने में इतना व्यस्त हो गई कि अपनी पहचान उजागर करना ही भूल गई। और आज जब पहली बार दिल की जगह दिमाग से कार्य करना चाहा तो सबसे पहले उसी ने यह प्रश्न मुझसे पूछ लिया कि मैं कौन हूँ और क्या चाहती हूँ ।
            एक बार तो मैं सोच में पड़ गई लेकिन तुरन्त संभलते हुए जवाब दिया कि ससुराल ही अब मेरा घर है अतः मैं इस घर की बेटी हूँ तो दिमाग खिलखिला कर हँस पड़ा और बोला कैसी बेटी किसकी बेटी ? ओर जब तुम इस घर की बेटी हो तो ये पुरूष कौन है जो तुम्हारे जीवन का मालिक दिख रहा है जिसे तुम अपना पति कहती हो ? और सच पूछों तो इस प्रश्न पर मैं फिर से जीवन के अनेक अनसुलझे पहलुओं कि तरह निरूत्तर हो गई। अनमनी सी अपनी विफलता पर झुंझला कर चिर परिचित अंदाज में टीवी का रिमोट हाथ में ले उसके चैनल बदलने लगी। लेकिन ये क्या आज तो मानो यह भी मेरे दिमाग से मिल कर मेरा दुश्मन हो गया है। सभी चैनल पर अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष में महिलाओ को अधिकार और शक्ति देने का ही ढोल पीटा जा रहा था। आखिर दिमाग की बात मानकर मैं भी इस विषय पर अपने मन के भावों को उकेरने में व्यस्त हो गई।
            जहां तक मैं समझ पाई हूँ महिलाओं से जुड़े समस्त आर्थिक, सामाजिक, कानूनी, राजनैतिक अधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा करके महिलाओं में आत्म विश्वास बढ़ाने से सम्बंधित कार्य ही महिलाओं का वास्तविक सशक्तिकरण है। लेकिन आज तो महिला दिवस या उनके सशक्तिकरण का विषय अधिकांश नेताओं, सरकारी या गैर सरकारी संगठनों की पसन्द का विष्य बन गया है जिसका इस्तेमाल वे अपना राजनैतिक कद बढ़ाने में कर रहे हैं। महिलाओं के अधिकारों का ढिंढोरा पीट कर एवं इस विषय पर विभिन्न आंदोलन, सम्मेलन एवं विचार गोष्ठियां आयोजित करके वे समाज के एक बडे़ वर्ग को भावनात्मक रूप से अपने साथ जोड़ने में कामयाब हो जाते हैं।
            हालांकि कुछ निस्वार्थ संगठनों के प्रयासों से महिलाओं में काफी जागरूकता आई है एवं उनका आत्म विश्वास भी बढ़ा है लेकिन तुल्नात्मक दृष्टि से देखा जाए तो यह नगण्य ही है। फिर भी मन में अनेक प्रश्न बार बार आते रहते हैं कि
  क्या वास्तव में महिला अशक्त ही जन्म लेती है ?
  क्या महिला बनने से पहले बालिका रूप में वह सशक्त होती है ?
         यदि यह मानव निर्मित समस्या है तो इसकी शुरूआत कहाँ से
   होती है ?
  क्या कभी इस समस्या का समाधान हो पायेगा ?
  क्या कभी महिला वास्तविक अधिकार पा सकेगी ?

             प्रश्नों का हल तलाशने से पहले हमें कुछ बातो को दोहराना होगा। दर असल जन्म के समय से ही बंधन को झेलती बालिका जब बड़ी होकर अपना घर बसा लेती है तो प्रत्यक्ष रूप से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि उसका दायरा बढ़ गया है लेकिन सुक्ष्मता से देखा जाए या स्वयं उस महिला से पुछा जाए तो ज्ञात होता है कि उसका दायरा तो और सिमट गया है।
            पिता के घर में रहते हुए पिता के स्नेह की छांव और माँ के दुलार के बीच आकाश में स्वछंद उड़ने की तमन्ना सदा उसके दिल में बनी रहती थी। ओर नही तो कम से कम एक माँ रूपी ढाल सदा उसकी अभिव्यक्ति की रक्षा करने के लिए तैयार रहती थी ओर इसी छॉव और स्नेह के बीच वह अपने नन्हे पंखों को फैलाकर अपनी शिक्षा और अन्य गतिविधियों को पूर्ण करते करते अपने होने वाले स्वर्णिम भविष्य और सुखद जीवन की कल्पना को साकार करने का महत्वपूर्ण कार्य कर पाती है।
           लेकिन शादी के बाद ससुराल में उससे सभी की कामना अपने अपने कार्यो की पूर्णता तक ही सिमट कर रह जाती है सास ससुर चाहते हैं कि वह घर का काम संभालने के साथ साथ सभी की पूर्ण देखभाल भी करे।  जीवन साथी चाहता है कि सम्पूर्णता बस उसी पर न्योंछावर कर दें और आज के परिपेक्ष्य में तो नौकरी एवं आर्थिक रूप भी इसमें जुड़ गये हैं।
          इन सभी आवश्यकताओं को पूर्ण करते करते वह स्वयं अपने सपने और खुशियों को भूल ही जाती है और इन बंधनो में जकड़ कर रह जाती है प्रत्यक्ष रूप से देखने पर उसका दायरा बड़ा जरूर दिखता है परन्तु सुक्ष्मता से अघ्ययन करें तो वह एक छोटे दायरे में ही सिमट जाती है। चाहकर भी उससे बाहर नहीं निकल पाती।
        महिलाओं को क्या करना चाहिए क्या नही करना चाहिए यह निर्णय भी स्वयं महिलाओं ने ही दूसरों को दे रखा है। क्या महिलाएं इतनी सक्षम नही हैं कि अपने कार्यो का निर्णय स्वयं कर सकें ?
           अधिकांश महिलाओं ने अपनी सोच ही सदैव अनुसरण करने की बना ली है तो फिर शिकायत भी क्यूँ करें और किससे करें उस समाज से जिसने नारी का एक सीमित दायरा तय कर दिया है चाहे उसको सामाजिक, धार्मिक या संस्कारों का नाम दे दिया जाता है लेकिन वास्तव में,  है तो वह एक अघोषित बन्धन ही ना । और फिर वर्ततान परिस्थिति के अनुसार कोई नया प्रतिबंध लगाना होता है तो हमारे अपने ही उसे कुल परम्परां का नाम देकर लगाने में बिल्कुल नही हिचकिचाते हैं।
            एक प्रश्न जो सदैव निरूत्तर रह जाता है और हो सकता है आपके अर्न्तमन में भी यह प्रश्न कभी ना कभी आया हो कि क्या महिलाओं की सुरक्षा एवं अन्य क्रिया कलापों का जिम्मा दूसरों को दिया जाना चाहिए ? क्या एक निश्चित सीमा से ज्यादा किसी का दखल नारी को वास्तविक स्वतंत्रता प्रदान कर पायेगा ?
         हमें यह बात भली भाँति समझ लेनी चाहिए कि कोई भी वर्ग हो पहले वो अपना हित देखेगा फिर ही दूसरों की भलाई के बारे में सोचेगा। क्या अभी भी महिलाएं यही समझती हैं कि इस तरह से सही मायने में महिला सशक्त हो पाएगी ? शायद नही,  तो क्या करना चाहिए ? आखिर एक नारी चाहती क्या हैं ?  नारी मात्र यही तो चाहती हैं कि
ऽ   कोई उसके प्रति संकीर्ण मानसिकता नही रखें।
ऽ   उसे अपने निजी निर्णय लेने की स्वतंत्रता हो।
ऽ   वो मात्र बहु,बहन,बेटी,माँ इन रिष्तों से ही नही पहचानी जाए उसकी स्वतंत्र पहचान हो सकें।
ऽ   नारी कोई खिलौना नही जिसमें चाबी भरकर चलाया जा सकें वह अपनी इच्छा से चल सकें।
          लेकिन ये सब होगा कैसे इसके लिए सरकार और जो संस्थाएं यह कार्य कर रही हैं वे तो अपना कार्य करती ही रहेगी लेकिन जब तक महिलाएं स्वयं की सहायता स्वयं नही करेगी कोई भी कानून या संस्था उनमें आत्मविश्वास नही भर पायेगी। इस सम्बंध में आपके जहन में भी अनेकों सुझाव आ रहे होंगे शायद उसमे से कुछ सुझाव निम्न भी हों।
    सर्व प्रथम समस्त महिलाओं को यह सोच बदलनी होगी कि हम आश्रित हैं। और यह तब ही संभव हो पायेगा जब महिलाएं आर्थिक रूप से सक्षम होंगी।
ऽ   आर्थिक सक्षमता तब ही संभव है जब प्रत्येक महिला शिक्षित होगी । इसके लिए बालिका शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित करके विभिन्न माध्यमों से जागरूकता फैलाकर प्रत्येक बालिका को शिक्षित करना होगा।
ऽ   प्रत्येक महिला के दिलो दिमाग से डर का भूत निकाल कर जो महिला शिक्षित ना सकें उसे अन्य रोजगार पुरक कार्यो के लिए प्रेरित करना होगा।
ऽ   प्रत्येक महिला आर्थिक स्वतंत्रता के लिए दूसरी महिला की हर संभव सहायता करें ।
ऽ   महिलाओं को राजनैतिक रूप से बिना जाति पांति भेदभाव के महिलाओं का समर्थन करके अपना वर्चस्व बढ़ाना होगा जिससे ऐसे कठोर कानून बनाने के लिए सरकारों को बाध्य कर सकें जिससे रोजगार में बराबरी का आरक्षण निश्चित किया जा सकें।
ऽ   जिस दिन प्रत्येक महिला रोजगार प्राप्त कर लेगी सही मायने में 75 प्रतिशत महिला सशक्त हो जायेगी इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हमारे शहरों में रहने वाली कामकाजी महिलाएं हैं।
ऽ   एक महत्वपूर्ण और कठिन कार्य हमें मिलकर करना होगा, वह है जीवन के विभिन्न पहलूओं पर सही निर्णय लेने की निर्भरता को कम करना ।
ऐसा नही है कि हमारे परिवार के पुरूष इसमें हमारी सहायता नही कर रहे हैं या सभी निर्णय गलत लिये जो रहे हों लेकिन किसी का विटो पॉवर बन कर उभरना अच्छा नही है। कॉमन विषय पर साझा निर्णय लेना सदैव हितकर रहता है।
ऽ   निर्णय लेने की क्षमता में एक महिला दूसरी महिला से सुझाव लेकर भी यह कार्य ज्यादा अच्छे ढंग से कर सकती है। इससे महिलाओं में आत्म विश्वास बढ़ेगा।

           यह सत्य है कि महिलाओं का हृदय कोमल होता है और किसी भी वर्ग को कष्ट देना या किसी का अहित उनसे सहन नही होता है लेकिन कोमलता का मतलब यह भी नही कि कोई भी उन्हें कुचल दे। यह भी सत्य है कि हम पुरूष प्रधान समाज में रह रहे हैं जहाँ अपना सर्वस्व न्यौछावर करके भी नारी को प्रथम दर्जा प्राप्त है आज सम्पूर्ण सक्षमता होने के बावजूद उसे किसी भी विषय पर निर्णय लेने से पहले पुरूषों की मौन स्वीकृति लेनी पड़ती है। यहां ऐसा कहने का तात्पर्य ये बिलकुल नही है कि पुरूष समाज को नजर अंदाज कर दिया जाए। क्योंकि हम यह भी जानते हैं कि एक सुखद परिवार के लिए जितना एक महिला जिम्मेदार है उतना ही एक पुरूष भी जिम्मेदार है लेकिन जब तक प्रत्येक नारी के भीतर छिपी असुरक्षा की भावना को पूर्ण रूप से खत्म नही किया जा सकेगा तब तक नारी अपनी सही ताकत तथा चुनौतियों से लड़ने की क्षमता को विकसित नही कर पायेगी।
         अन्त में कह सकते हैं कि दर असल यह समस्या शारीरिक ना होकर मानसिक ज्यादा है। अर्थात प्रकृति के अनुसार तो एक महिला एक पुरूष से ज्यादा सक्षम है तभी तो उसे पुरूष से ज्यादा सहनशीलता का अधिकार, जन्म देने का अधिकार और भी अनेक विशिष्ठताएं प्रदान कि गई है। लेकिन संकीर्ण मानसिकता के कारण ही उसे कमजोर आंका जाता है अतः आज प्रत्येक महिला कम से कम ये प्रण जरूर लें कि एक महिला होकर दुसरी महिला के अधिकारों का हनन नही करूंगी और ना ही अपने सामने किसी नारी के अधिकारों को कुचलने दूंगी तब ही सम्पूर्ण समाज की मानसिकता को बदला जा सकेगा।

        यदि अन्जाने में इस आलेख की किसी पंक्ति से आपकी भावनाओं को ठेस लगी हो तो आपसे पुनः क्षमा चाहूंगा। यह सब लिखने के पीछे मेरा उद्धेश्य आपका ध्यान इस ओर आकर्षित करने का प्रयास मात्र है क्योंकि प्रयास प्रारम्भ करना ही किसी मंजिल को पाने का सर्वोत्तम तरीका है।

Saturday, November 02, 2013

दीपोत्सव

            आखिर इंतजार खत्म हुआ ........ सच इस कार्तिक माह की अमावस्या ने कितना इंतजार करवाया, और स्वागत की तैयारियो ने तो मेरे बजट की गाड़ी पटरी से ही उतार दी, चलो कोई बात नही, असत्य पर सत्य की विजय और अंघकार पर उजाले की छटा बिखेरने वाले दीपोत्सव पर्व की खुशियों के लिये सब मंजूर है।

         आज किसी बच्चे को प्रातः जगाने के लिए आवाज नही लगानी पडी, घर में खुशनुमा माहौल है, लग रहा है कि घर के प्रत्येक कोने में साफ और सुन्दर दिखने की होड लगी है और किचन से आती पकवानों व मिठाइयों की खुशबू से तो ऐसा लग रहा है मानो किचन तो अपनी गृह स्वामिनी के साथ मिलकर शाम होने से पहले ही अपने आप को विजेता घोषित करवा लेना चाहती है ।

        मेरे हिस्से हर दिपावली की भाँति इस बार भी मन्दिर का कमरा और पूजा की तैयारियों का काम आया है, मैंने अपनी दोनों बेटियों के साथ मिलकर जल्दी से मन्दिर की सफाई करवाई और पूजा के प्रथम चरण मांडणा (रंगोली) के लिए पुत्रियों को लगाया । मांडणे मे स्वास्तिक बनाते हुए पुत्री ने पूछा, ये स्वास्तिक क्यों बनाते हैं ? जवाब में मैंने अपनी माँ से विरासत में मिले ज्ञान को उन्हे बताते हुए कहा कि हमें प्रत्येक शुभ कार्य की शुरुआत स्वास्तिक चिन्ह बनाकर करनी चाहिये क्योंकि यह सुख-सौभाग्य, मंगल कामना का द्योतक तथा सूर्य और भगवान विष्णु का प्रतीक माना जाता है, इसकी खडी व आडी रेखाओ से मिलकर बनने वाला +चिन्ह हमें चारो दिशाओं का प्रतीक है इसके मध्य भाग को भगवान विष्णु की नाभि, चारों रेखाओं को ब्रह्मा जी के चारों मुख एवं चारों भुजाओं को चारों वेद माना जाता है । स्वास्तिक चिन्ह देवताआंे का ओज (तेज) स्वरुप है जो हमारे जीवन में शुभता लाता है इसीलिए व्यापारी वर्ग इसे शुभ-लाभ का प्रतीक भी मानते हैं ।

        पुत्रियाँ मन्दिर का मांडणा (रंगोली) पूरा कर बाहर देहरी  तथा आंगन मे मांडणा मांडणे चली गई थी और मैं इस त्यौहार के मुख्य पात्र मिट्टी के दीपकों को स्वच्छ पानी मे डालते हुए सोचने लगा कि इंसान और इस मिट्टी के दीपक में कितनी समानता होती है। इंसानो की ही तरह दीपक भी पंच तत्वों  ( मिट्टी , पानी, हवा, वातावरण, आग) से बना होता है । इसे बनाने वाला कुम्हार तालाब की मिट्टी को कूट-कूट कर, पानी मिलाकर लोना बनाता है फिर उसे चाक पर लगाकर अपने कुशल शिल्पी हाथों से दीपक के आकार का सृजन करता है फिर उसे सुखाकर धीमीं-धीमीं आग में पकाता है अर्थात् कुम्हार भी हमारी जन्मदात्री माँ की तरह दीपक की माँ बनकर उसे पूर्ण रुप प्रदान करता है । इस बातों को सोचते सोचते मेरा मन भावुक हो उठा , मेरे मन में दीपक क्या सोचते हैं या क्या बातें करते हैं यह सुनने की जिज्ञासा जाग गई और मैं मन ही मन लक्ष्मी माँ से इनसे बातें करने की शक्ति मांगने लगा............, 

         अरे, ये क्या मुझे तो सचमुच दीपकों के बीच चल रही बहस सुनाई देने लगी । एक नौजवान दीपक कुम्हार पर नाराज होते हुए कह रहा था मुझे दीपक नही बनना था मुझे तो एक फूलदान का आकार चाहिये था जिससे  मुझे कोई सुन्दर सी लड़की खरीद कर अपने घर ले जाती, मुझे संवारती, फूल लगाती और इठलाती हुई ड्राइंग रुम में सजाती । दूसरा दीपक उसकी बात काटते हुए बोला, ड्राइंग रुम मे रखे-रखे जब कई दिन तक तुम्हारे ऊपर से धूल नहीं हटायी जाती तो तुम्हे कैसा लगता , इसीलिये मुझे तो दुर्गा या गणपति की बड़ी मूर्ति बनना था जिससे लोग कई दिनो तक मेरे दर्शन करते, पूजा अर्चना करते फिर बैण्ड बाजों के साथ मेरा विसर्जन किया जाता । इसकी बात काटते हुए बीच में ही तीसरा दीपक बोल उठा आजकल इंसान ने शहरों में विसर्जन के लिए स्वच्छ तालाब या नदियां छोड़ी ही कहाँ हैं , यदि तुम्हारा विसर्जन करने की बजाय कम पानी में तुम्हें छोड दिया जाता तो तुम्हें कितना कष्ट होता, इसीलिए मेरी इच्छा तो ऐसा खिलौना बनना था जिससे मैं देव स्वरुप बच्चों के संग खेलता और उनका मन मोह लेता, वे मेरे सिर पर बने छेद से पैसे डालकर बचत करने की आदत भी सीखते । चौथे दीपक ने उसकी तरह मुँह बनाते हुए कहा, आजकल बाजार मे सस्ते रंग बिरंगे चीनी खिलौने आ गये हैं,  नये बच्चे तो मिट्टी के खिलौने जानते ही नही हैं जब तुम्हे कोई नही खरीदता तो तुम्हे बनाने वाले कुम्हार का दिल कितना दुखता, सोचा है तुमने, इसलिये मैं तो मिट्टी का वह तवा बनना चाहता था जिसे कोई गरीब आदमी खरीद कर जब घर ले जाता तो मुझे देखते ही उसकी पत्नि खुश हो जाती, मैं चूल्हे पर आग सहकर भी उसके परिवार को मुलायम रोटियां सेककर खिलाता तो मेरा जीवन धन्य हो जाता।

         इसी बहस में अन्य दीपक भी बोलना चाह रहे थे लेकिन सबसे बडे दीपक ने बहस बढ़ते देख सबको समझाते हुऐ कहा, कोई भी आकार या रुप छोटा बड़ा नहीं होता है हमारे कर्म हमें छोटा या बड़ा बनाते हैं इसीलिए प्रकृति ने कुम्हार के माध्यम से तुम्हें जो स्वरुप प्रदान किया है वह सर्वश्रेष्ठ है। आज हम लक्ष्मी माँ के पूजन मे रखे जायेंगे ये हमारा सौभाग्य है। अभी जब हम बाती, तेल, वायु और अग्नि के साथ मिलकर एक सयुंक्त परिवार के रुप मे प्रकाश फैलायेंगे तो अज्ञानता का अंघेरा हमारे प्रकाश से डरकर दूर चला जायेगा जिससे हमारा यह जन्म सार्थक हो जायेगा। हमारा कर्म हमें आकार में छोटा होते हुए भी सभी से महान बना देगा ।
     
        सभी दीपकों की बहस सुनते सुनते मैंने उन्हें जल से निकाल कर उनमें बाती, तेल व प्रसाद आदि रखकर पूजा के लिये तैयार कर  दिया था और पटाखों की थैली से पटाखे निकाल कर बाहर रख रहा था कि अचानक चौंक कर रुक गया  मुझे उनकी भी बातें सुनाई दे रही थी उत्सुकता से मैं उनकी बहस सुनने लगा, एटम बम बडे गुरुर मे भरकर कह रहा था मैं सर्व शक्तिमान हूँ मुझे कमजोर दिल वाले तो चलाने की हिम्मत ही नहीं करते और जब मैं फूटता हूँ तो अच्छे- अच्छे काँप जाते हैं। उसकी बात खत्म होने से पहले ही अनार बीच में बोलने लगा, इसीलिए तुम्हें ज्यादा लोग पसन्द भी नही करते हैं मुझे देखो महिलाएँ, बच्चे और बडे़ सभी बड़े चाव से मेरी बाती में आग लगाते हैं और मैं जलते समय अपने अन्दर भरे रंग बिरंगे सितारांे को पूरे वेग से निकाल कर रात में भी दिन सा प्रकाश फैला देता हूँ । इस बहस में जमीन चक्कर कहाँ चुप रहने वाली थी वो भी बोलने लगी मेरी तरह रोशनी फैलाते हुए कोई नही नाच सकता, मौका देख बमों की लड़ी भी अपनी एकता के आगे कोई नही टिक सकने का पाठ पढ़ाते हुए इतराने लगी । 
      
         शायद बड़ी फूलझड़ी मेरी और घ्यान से देख रही थी इसीलिए उसने सभी को शांत करते हुए कहा,  तुम सभी अच्छे हो लेकिन कुछ बातें मुझसे सीखो, जैसे मैं बच्चों से बड़ो तक सभी को पसन्द आती हूँ , मेरे शरीर में घातु का तार होने पर भी मैं शिकायत नही करती, मुझे जलाने के लिये काफी धैर्य रखना पड़ता है अर्थात् मैं धैर्य शीलता का पाठ पढ़ाती हूँ , मैं जलने पर सितारों वाली रोशनी फैलाती हूँ । मेरे से अन्य पटाखो में आग लगाई जाती है अर्थात् मैं दूसरों के काम आती हूँ  , पूरी जलने के बाद भी मेरे तार को एक तरफ रखा जाता है जो मेरी शक्ति का प्रतीक है। मैं तुम सभी से बड़ी होने के नाते समझा रही हूँ हमें आपस में बहस नही करनी चाहिए क्योंकि हम सभी बारी बारी से जलकर ही सभी को पूर्ण आनन्द देते हैं ।

         पूजा की तैयारी हो गई क्या..............? नये कपडे़ पहन लो मुहूर्त का समय होने वाला है, इस आवाज ने मेरा घ्यान वापस तोड़ा, सभी जल्दी से तैयार हुए और सपरिवार लक्ष्मी जी, गणेश जी और सरस्वती माँ की पूजा की । सभी मंदिरों में दीपक रख कर आए फिर लक्ष्मी जी के सामने फूलझडियाँ जलाई और सभी बड़ों को प्रणाम कर बाकी पटाखे लेकर बाहर खुले में आ गये । सभी आने वालों को शुभ कामनाएँ देते हुए पटाखे जलाने लगे, आपको भी दीपावली की हार्दिक शुभ कामनाएँ, आपकी पूजा पूर्ण हो गई हो तो आ जाइये पटाखे जलाते हैं।

डी पी माथुर

Monday, October 14, 2013

एक प्रश्न

                    हमारे जीवन की तमाम उलझनों से हम प्रतिदिन रूबरू होते रहते हैं, हमारा प्रतिदिन का लगभग 98 प्रतिशत कार्यक्रम भी पूर्व में ही निर्धारित किया हुआ होता है । अर्थात यदि व्यस्क हैं तो प्रातःकाल जल्दी जागना, तैयार होना, ईश वन्दना फिर रोजगार के दस धन्टे और शाम को घर परिवार का मिलन, टी वी या अन्य साधन से कुछ मनोरंजन या सूचनाएं एकत्र कर अपने दिमाग में भरना, भोजन और फिर सो जाना । और यदि घरेलु महिला हैं तो इसी दिनचर्या में रोजगार वाले दस धन्टों में साफ सफाई, घर के अन्य सदस्यों के काम करना, टी वी ,मनोरंजन, आराम फिर भोजन बनाकर सभी के आने की प्रतिक्षा , भोजन और निंद्रा शामिल हो जाता है। कामकाजी महिलाओे पर दोनो तरह के कार्यो का दबाव अतिरिक्त आ जाता है।
                  नव युवक एवं विधार्थी इस जीवन चर्या को पाने के लिए प्रयासरत नजर आते हैं और अधिकांश बुजुर्ग अपने जमाने के विभिन्न शौर्य किस्से सुनाने और नई पीढ़ी को कोसने में व्यस्त नजर आते हैं अर्थात गृहस्थ जीवन जीने वालों की बात की जायें तो 1-2 प्रतिशत बुजुर्गो को छोड़कर बाकी सभी इसी दिनचर्या चक्र में सम्पूर्ण जीवन बिताते नजर आते हैं।
                 इस भागमभाग के बीच हमारे पास इतना समय नही होता कि हम एक पल भी कुछ अलग तरीके से सोच सकें। जैसे, क्या हमारा इस धरती पर जन्म इसी दिनचर्या को जीने के लिए हुआ है ?, क्या हमारे अस्तित्व का मूल उद्देश्य यही सब करना है या था ? क्या हमने कभी इन प्रश्नों का उत्तर तलाशने की कोशिश की है ?
                 जब विषम परिस्थितियों से हमारा सामना होता है तब जिन्हें हम अपने समझते हैं वो भी हमारा साथ छोड़ जाते हैं जीवन की तेज रफ्तार में समयाभाव के कारण जो प्रश्न हमें निरर्थक प्रतीत होते थे वो विषम परिस्थितियों से उपजे एकाकीपन में सार्थक प्रतीत होने लगते हैं। और हमें एक पल के लिए सोचने को मजबूर जरूर कर देते है यदि आपको इन प्रश्नों का उत्तर मालूम है तो आप भाग्यशाली हैं और यदि नही मालूम तो क्या आप जानना नही चाहते हैं कि हमारे जन्म का उद्देश्य क्या है ? हमें इस जन्म में क्या करना चाहिए ? क्या हम जिस दिशा में चल रहे हैं वही हमारी सही राह है ?

                ये सभी प्रश्न पढ़ने में बहुत सहज और सरल प्रतीत होते हैं। और एक रफ्तार में हम बहुत सहजता से इन्हें पढ़ जाते हैं चूकिं समयाभाव या गृहस्थी के चक्र्र के कारण इनका उत्तर तुरन्त नही खोज पाते इसीलिए हम इस प्रकार के प्रश्नों को गृहस्थ जीवन के विपरीत मात्र साधु सन्तों के लिए या आध्यात्मिक व्यक्तियों के लिए मान कर पल्ला झाड़ने की कोशिश में लगे रहते है । अर्थात हम धर्म गुरूओं के उत्तर को ही अपना उत्तर भी मानने के लिए तैयार हैं या ऐसा समझ लें कि उनके जीवन के उद्देश्य को हम अपने जीवन का उद्देश्य मान लेने को तैयार हैं । तो क्या फिर हमें भी अपना जीवन उनकी तरह जीना चाहिए ?

               ऐसा शायद नही है , गृहस्थ जीवन छोड़कर अकेले रहने से आप चुनौतियों से दूर हो जायेंगे फिर आपका परिश्रम आधा ही रह जायेगा। वैसे भी गृहस्थ जीवन को सफलता पूर्वक निभाना सबसे कठिन साधना का प्रतीक माना गया है जो इससे विमुख होकर आध्यात्मिकता में लीन हो जाता है उसका जीवन के रहस्यों को समझने का अपना नजरिया बन जाता है और घर परिवार की जिम्मेदारियों को भलीभाँति निभाते हुए जीवन के रहस्यों को समझना उससे भी कठिन कार्य है ।

              हमारे आध्यात्मिक गुरूओं ने कहा है कि हमारी आत्मा ईश आत्मा का एक अंश है । जब ऐसा हम मानते हैं तो क्यों ना हमारे मन में उठते प्रत्येक प्रश्न का जवाब भी किसी और से पूछने की बजाय हमारे अन्दर विद्यमान उसी परम आत्मा के अंश से ही प्राप्त करें। ऐसा करने के लिए एक सरल सा तरीका है हमें स्वयं से प्रश्न पूछना होगा अर्थात प्रश्न कर्ता और जवाब देने वाले के बीच और कोई व्यवधान ना रहे ऐसी स्थिति बनानी होगी इसके लिए अपने मन को सांसारिक कर्तव्यों से कुछ पलों के लिये अलग करके एकान्त में बैठना होगा। न्याय के तराजु की तरह तटस्थ रहते हुए स्वयं अपने आप से ऊपर बताये गये प्रश्नों को पूरे मनोयोग से करना होगा।

             हो सकता है प्रथम बार में इनमें से किसी भी प्रश्न का जवाब ना मिलें। लेकिन यह निश्चित है कि यदि ऐसा लगातार कुछ दिन किया गया तो विभिन्न जवाब हमारे सामने आने लगेंगे उनमें से प्रत्येक जवाब का अपना एक वजूद होगा प्रत्येक जवाब किसी ना किसी दृष्टिकोण से सही प्रतित होगा। ऐसे ही कुछ विचार निम्न हैं जो जवाब के रूप में मन में आ सकते हैं।

             प्रथम - यह संसार व्युत्पत्ति और विनाश का एक क्रम है जो निरंतर चलता रहता है और अन्य जीवों की तरह ही इंसान भी उसी कडी के एक हिस्से के रूप में जन्म लेता और मरता है। हमारा जन्म हुआ और इसी प्रकार आगे भी जन्म होते रहेंगे अर्थात यह एक प्राकृतिक और निरंतर चलने वाली प्रक्रिया मात्र ही है और चुकिं हमारा जन्म हुआ अतः हमें अपनी आजीविका चलाने के लिये हमारे पूर्वजों ने जो नियम बनाये उसी प्रकार निर्वाह करना होगा और इसी प्रकार की रोजगार पूरक शिक्षा हम लेते भी हैं।

             दूसरा- कारण आध्यात्मिक है अर्थात इस पूरी सृष्टि को चलाने वाली कोई देव शक्ति है जो विभिन्न जीव आत्माओं को उनके पिछले जन्म में किये कार्यो के आधार पर इस जन्म में शरीर देती है और जब एक निश्चित समय अवधि में हम कर्म कर लेते हैं तो पुनः हमें नये रूप में शरीर प्रदान कर दिया जाता है। अर्थात हमारे कार्य की जिम्मेदारी स्वेच्छा से निर्धारित नही होती है।

              तीसरा -कारण केवल आधुनिक सोच और वैज्ञानिकता से मिलता जुलता हमारे मन में सकता है कि हमारे माता पिता को हमारे जन्म से पूर्व यह नही मालूम था कि हम ही जन्म लेंगे और ना ही वो हमारा जन्म करवाने के लिये वचन बद्ध थे हमारा जन्म एक सांसारिक प्रक्रिया का परिणाम है इस कारण हमें इस इंसान रूपी शरीर को धारण करना पड़ा और हमारे माता पिता अपने अच्छे अनुभवों के अनुसार हमसे वो ही नियम अनुसरण करवाते हैं जिससे हमारा जीवन अच्छी प्रकार बीत जायें। इसे ही हम पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाते जाते हैं अर्थात हम हमारे पालन कर्ता के अनुसार अपनी शिक्षा और रोजगार का निर्धारण करते हैं। पूर्व निर्धारित कोई भी लक्ष्य हमसे नही जुड़ा होता है  

               हम सभी की मानसिक दशा, अनुभव और ज्ञान के अनुसार और भी अनेक प्रकार के जवाब हमारे मन में आयेंगे और वो हमे सर्वाधिक उपयुक्त भी प्रतीत होंगे । और हो सकता है आप इस लेख को पढ़कर हँसते हुए कह जायें ”ये सब सोचना बकवास है इससे किसी का पेट नही भरता“, आपका यह सोचना किसी हद तक सही भी है लेकिन सत्यता इससे परे है ।

             दरअसल यह एक ऐसा गंभीर विषय है जिसके बारे में प्रत्येक इंसान के स्वतंत्र विचार हो सकते हैं और इस तेज रफ्तार जीवन में स्वयं के लिये किसी के पास समय नही है आज हमने अपना सारा समय भौतिक सुख सुविधाओं की व्यवस्था करने या परिवार की आवश्यकताओं पर केन्द्रित कर रखा है। लेकिन यह भी सत्य है कि स्वयं से प्रश्न करने पर और कोई अहसास हो या ना हो पर यह अनुभूति तो जरूर होगी कि मैं सांसारिक रोजगार पूरक ज्ञान ही रखता हूँ एवं स्वयं की भाषा, शरीर, आगमन, निर्गम के बारे में अनपढ़ ही हूँ ।                                                                      
              इस विषय का कोई अन्त नही है और ना ही इस छोटे से लेख के माध्यम से आपसे चर्चा कि जा सकती है और जब तक किसी से सार्थक चर्चा ना हो निष्कर्ष निकलना नामुमकिन है अतः लेखनी को विराम देते हुए अन्त में इतना जरूर कहा जा सकता है कि यदि हमने अपने आप से प्रश्न किए तो हमारी दिनचर्या और सोचने की दिशा निश्चित रूप से बदलेगी एवं जीवन में ज्यादा सकारात्मक सोच बनने लगेगी इसी के साथ साथ नित्य प्रति की समस्याओं को अधिक आसानी से सुलझाने में मदद मिलेगी और घरेलू निर्णय ज्यादा आसानी से एवं सही रूप से लेने की क्षमता अपने अन्दर विकसित कर सकेंगे । यदि ऐसा हो सका तो इन पंक्तियों को लिखने का उद्देश्य पूर्ण व सार्थक हो पायेगा।

डी पी माथुर

Sunday, October 06, 2013

अभिव्यक्ति का एक प्रकार आलोचना

          हमारे जीवनयापन की आवश्यकताओं के बाद सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता होती है हमारी अभिव्यक्ति अर्थात हमारी बोलने की जरूरत, जिसके बिना इंसान का जीवन कष्टमय हो जाता है । यदि किसी को कठोर सजा देनी होती है तो उसे चुप रहने के लिए कहा जाता है।

         जैसा कि हम जानते हैं कि प्रत्येक आयु वर्ग के इंसानों में ज्यादातर अलग अलग विषयों पर बातचीत की जाती है। छात्रों में अपने स्कूल, खेल आदि की बात की जाती है तो घरेलू महिलाओं में ज्यादातर घर परिवार या टी वी सीरियल तथा पास पड़ौस का विषय मुख्य होता है। इसी प्रकार कामकाजी महिलाओं, पुरूषों तथा बुजुर्गो के बातचीत के विषय अलग अलग होते हैं। ऐसा होेना स्वाभाविक भी है क्योंकि हम सभी का मानसिक ज्ञान , कार्य स्थली, संगी साथी तथा हमारे आस पड़ौस का वातावरण भिन्न भिन्न होता है।

        लेकिन क्या आपने ध्यान दिया है कि एक ऐसा सामान्य विषय है जिसका प्रयोग लगभग सभी आयुवर्ग और प्रोफेशन के लोगों द्वारा कभी कभी अपनी बातचीत में किया जाता है ! जी हाँ आप सही समझ रहे हैं हम यहां आलोचना के अनेक रूपों यथा व्याख्यात्मक ,सैद्धान्तिक ,निर्णयात्मक ,प्रभाविक आदि में से एक व्यवहारिक रूप की ही चर्चा कर रहे हैं।

        आलोचना करना या परनिन्दा करना एक ऐसा विषय है जिसकी अपनी कोई सीमा या परिभाषा नही होती वो प्रत्येक इंसान और स्थिती में बदल जाता है पर सदा मौजुद रहता है । किसी के बारे में विश्लेषण के लिये समालोचना की जाती है तब तक तो अच्छा है पर जब यह परनिन्दा का रूप ले लेती है तो बुराई की श्रैणी में आ जाती है। आलोचना के इस रूप को जाने अनजाने हम सभी अपनी वार्तालाप में स्थान दे ही देते हैं।

       दरअसल आलोचना का अर्थ है किसी भी इंसान या वस्तु के सभी अच्छे बुरे गुण एवं दोषों को अच्छी तरह परख कर उसकी विवेचना या समीक्षा करना। इस विधा का उपयोग करने से जिसकी आलोचना की जाती है उसे अपनी कला में और सुधार करने की प्रेरणा मिलती है किन्तु यह बीते जमाने की बात हो गई प्रतीत होती है आजकल की आधुनिक आलोचना तो बस व्यक्तिगत निन्दा का ही रूप धारण कर चुकि है एवं पहले की भाँति अब किसी की आलोचना करना प्रोत्साहित करने की बजाय उसके दिल को ठेस पहुँचाने का कार्य करता है। इतना ही नही आज धन का उपयोग कर कुछ धनाढ़य अन्य साहित्यकारों की रचनाओं को अपनी रचना घोषित करवा कर अपने पक्ष में प्रशंसा वाली व्याख्या और विश्लेषण करवाने में भी कामयाब हो जाते हैं।

          महिलाओं के बारे में यह किवंदती है कि वे निन्दा अधिक करती हैं लेकिन सच में ऐसा नही है। पुरूषों द्वारा भी समान रूप से निन्दा की जाती है लेकिन उनकी निन्दा दिखाई नही दे पाती क्योंकि पुरूष कम बोलते हैं और महिलाएं अधिक बोलती हैं। यदि दोनो के बोलने के अनुपात में निंदा का आकलन किया जाये ंतो प्रतिशत में रेश्यो लगभग समान ही आयेगा।

      एक कारण और है निन्दा सदैव कुछ औपचारिक बातों को करने के बाद वार्ता को आगे बढ़ाने के रूप में प्रारम्भ होती है चूंकि पुरूष ज्यादा बातें नही करके मात्र औपचारिक बातें ही करते हैं अतः निन्दा प्रारम्भ होने से पूर्व ही उनकी बात खत्म हो जाती है इससे यह भ्रम बनता है कि पुरूष निन्दा नही करते । यदि पुरूषों को लम्बी बातें करनी पड़ती है तो वहां भी निन्दा आ ही जाती है।

         इंसान निन्दा क्यूं करता है यदि हम इसका विश्लेषण करने की कोशिश करें तो अनेकों तथ्य सामने आते है जैसेः

प्रथम- वार्ता को लगातार आगे बढ़ाने के लिए कोई ना काई विषय चाहिए होता है और वार्ता करने वाले दो व्यक्ति जिस तीसरे को जानते हैं उसके बारे में बात करना काफी आसान होता है।

द्वितीय- व्यवसाय या कार्य क्षेत्र में यदि कोई लगनपूर्वक कार्य करता है तो अन्यों की नजर में उसकी पैठ विकसित होने लगती है क्योंकि कार्य सभी को प्यारा होता है अतः उसके साथियों द्वारा उसकी निन्दा प्रारम्भ हो जाती है।

तृतीय-  इंसानी प्रवृति है कि कोई आपका घरेलू या जानकार सदस्य आपसे ज्यादा उन्नति कर रहा है तो उससे ईर्ष्या भाव पैदा होने लगता है अब चूंकि उसके सामने उसकी निन्दा करके उससे सम्बन्ध खराब नही करना चाहते हैं अतः उसके पीछे से निन्दा करके मन का असंतोष निकाला जाता है।

चतुर्थ- आज के जमाने में इंसानी हैसियत मात्र पैसे के दम पर आँकी जाती है जो जितना धनाढ़य उसकी उतनी ही इज्जत और हैसियत समझी जाती है एवं उसके नजदीक के लोगो के लिये उसकी निन्दा अपनी हैसियत नीचे ना दिखें इसलिए कि जाती है।

          धनाढ़य वर्ग द्वारा गरीब की निन्दा उसकी हँसी उड़ाने के लिए की जाती है। इसी प्रकार सभी की चहेती घरेलू महिला की अन्य बराबर वाली महिलाओं द्वारा निन्दा किया जाना भी आम रूप से देखा जाता है। और भी अनेक कारण आपकी नजर में होंगे लेकिन मुख्य बात ये है कि क्या हमें अपनी इस बुरी आदत पर लगाम लगाने की पहल नही करनी चाहिए ? जब भी हमें आलोचना करने का मौका मिले जरूर करें लेकिन उस आलोचना में सामाजिक स्थिति, वातावरण, आलोचित होने वाला साहित्य या व्यक्ति तथा परिस्थितियों को देखते हुए अपनी बुद्धि का सही रूप से उपयोग करते हुए यह ध्यान रखें कि इस आलोचना का उस पर सकारात्मक प्रभाव पड़े। यदि ऐसा हो सका तो इन पंक्तियों को लिखने का उद्देश्य पूर्ण व सार्थक हो पायेगा।

                                 डी पी माथुर

पूर्व में ओ बी ओ पर प्रकाशित मेरी रचना

Wednesday, October 02, 2013

श्राद्ध

                      चिड़ियों की चहचहाहट और कोयल की कूह कूह ने नित्य की तरह फिर से प्राकृतिक अलार्म बजाकर भोर होने का संदेश सुनाया और मैने कुछ पल सुस्ताते हुए बिस्तर त्याग दिया। लाईट जली देख कर कुछ ही देर में पत्नि भी उठ गई और अपने कमरे से अंगड़ाई लेती हुई बिना बात किये मात्र औपचारिक मुस्कुराहट के साथ अपने दैनिक कार्यो में व्यस्त हो गई। आज प्रातः घर का माहौल कुछ अलग अलग भारी सा प्रतीत हो रहा है और दिनों की तुलना में आज कुछ ज्यादा ही शांति महसूस हो रही है। मैं भी अपने दैनिक कार्यो के बाद अखबार के पन्नों को बदलते हुए, सब कुछ सामान्य ही है ऐसा दिखाने की चेष्टा कर चुपचाप बच्चों के जागने की प्रतिक्षा करने लगा फिर कुछ देर में ही उकता कर अपनी पसंदीदा कलम से मन के उदगारों को आकार देने में व्यस्त हो गया ।

                    दरअसल आज ही के दिन मेरी परम पूज्य करूणामयी माँ हम सभी को छोड़ कर स्वर्ग सिधार गई थी शायद ईश्वर को उनकी याद आ गई थी। और कल रात देर तक मैं और धर्म पत्नि माँ के बारे में बातें करते करते सोने चले गये थे। आज उनका श्राद्ध है ।

                    माँ के बारे में सोचकर जब मन उदास होने लगा तो तुरन्त दूसरे मन ने उसे ढ़ाढ़स बंधाते हुए समझा दिया और यह प्रकृति का क्रम यूंही चलता रहेगा। मन की बात मानते हुए गुजरे जमाने की यादों में खोने लगा और महसूस करने लगा कि माँ चाहे हमारे पास से भौतिक रूप से चली गई हों पर उनका प्यार तो आज भी पूर्ववत निरंतर हम पर अपनी करूणा बरसा रहा है। एक माँ का अपने बच्चों के लिए प्यार और त्याग कितना गहरा होता है यह अहसास उनके जाने के बाद ज्यादा व्याकुल कर देता है , नम आँखें माँ के लिये सोचती सोचती कब छलकने लगी इसका अहसास ही नही हो पाया, हाथ की कलम शब्दों को उकेरते उकेरते कांपने लगी। आँखो से निकल कर अश्रु जब कागज पर गिरा तो अहसास हुआ कि यह माँ का पुत्र पर दर्शाया प्यार ही है जो इतना ज्यादा हो गया है कि शरीर में समा नही पा रहा है और अपनी सीमाएं लांघकर आँखों के द्वार से बाहर छलक गया है।

                 मेरी कलम को स्वतः ही विराम मिल गया , मैने अपना चश्मा उतारा और आराम कुर्सी से सर लगा कर शुन्य में देखने लगा। कुछ ही पलों में मैने अपने चश्में को साफ करके वापस लगाया और अपने लैटर पैड को उठा कर वापस कलम चलाते हुए विचारों के अथाह समुंद्र में खो गया।
यह कैसा रूप है प्यार का ?

                हम सभी जीवन में प्यार के सभी रूपों से रूबरू होते रहते है जैसे मित्रों, पारिवारिक सदस्यों और सहृदय पत्नि का पल पल छलकता प्यार एवं एक पिता होने की जिम्मेदारी के साथ महसूस किया जाने वाला प्यार।

                दरअसल प्यार और करूणा का जो रूप एक माँ में विद्यमान होता है वह ओर कहीं भी नही दिख सकता जिसमें प्रेम, त्याग, वात्सल्य और अनेकों रूपों का समावेश है। मैं अपनी इन पंक्तियों  के माध्यम से आपके मन में एक पल के लिए माँ की याद दिलवा सका यही मेरी माँ का सच्चा श्राद्ध और एक पुत्र होने का कर्तव्य है।

भीड़ में तन्हाई सता रही है ,
अकेला हूँ , अहसास करा रही है ,
आत्मा , शरीर  बन्धन में छटपटा रही है,
यादें बोझ बनकर , क्यूं रूला रही है,
ये आज पल-पल, माँ क्यूं याद आ रही है ।

डी पी माथुर