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Saturday, May 02, 2020
Saturday, April 11, 2020
Friday, November 01, 2019
करीब रहने दो
दिल के करीब हैं,
करीब रहने
दो।
पल दो पल के जीवन में,
सुकून देता है,
दोस्ती का
भ्रम।
मुस्कुराने के लिए ही सही
कुछ भ्रम ही, बना रहने दो
।
कर्जदार हूं, आपके स्नेह का
मुझ पर इसे उधार रहने दो।
अपनों की याद दिलाता है ये कर्ज़
चूक ना जाय,
मुझे कर्ज़दार रहने दो।
स्वरचित पंक्तियां दोस्तों को समर्पित
:- डी पी
माथुर जयपुर
Friday, October 25, 2019
आओ मन के दीप जलाएं
आओ मन के
दीप जलाएं
कुछ मन का
अंधियारा मिटाएं।
रूप चतुर्दशी में निखर
चेहरों पर मुस्कान
खिलाएं।
हरी भरी फसलों
की क्यारी
खेत खेत लहलहाए।
सुख समृद्धिए धन धान्य
घर घर खुशहाली
लाएं।
आओ मन के
दीप जलाएं………………
सूरज की ज्योति
से लेकर
हम सब भी
एक दीप जलाएं।
पनप रहे मन
के जालों को
नव चेतन से
दूर भगाएं।
बिछूड गए जो
अपने उनको
फिर से गले
लगाएं।
मिल.जुल कर
कुछ अपनों से
चहूं ओर खुशियां
फैलाएं।
घर सजा रंग
रोगन से
मन में भी
नई ऊर्जा लाएं।
आओ मन के
दीप जलाएं………………….
असंख्य टिमटिमाते तारों संग
कुछ जगमग से
दीप मिलाएं।
दीप शिखाओं की श्रंखला
में
मन का भी
एक दीप जलाएं।
मां लक्ष्मी के स्वागत
से
हर घर हर
चेहरा खिल जाएं।
तन मन के
दीपक में
आत्मीयता की बाती
बनाएं।
आओ मन के
दीप जलाएं
कुछ मन का
अंधियारा मिटाएं।
स्वरचित. डी पी
माथुर जयपुर
Friday, August 28, 2015
रक्षा बन्धन
रक्षा बन्धन
· बन्धन होकर भी जो]
स्वतंत्रता का] अहसास करा दे]
बहना की] एक मुस्कुराहट पर]
भाई] अपना सर्वस्व लुटा दे]
वही राखी कहलाती है।
· उत्साहित बहना] के सपनों को]
भैया अपने पंख लगा दे]
सावन की पूर्णिमा का]
जो
रिश्तों में] प्रकाश फैला दे]
वही राखी कहलाती है।
· उमड़ते घुमड़ते] प्यार से जो]
मन
में] एक सागर लहरा दे]
खटटे मीठे] रिश्तों को जो]
एक] अटूट बंधन बना दे]
वही राखी कहलाती है।
· भौतिकता की आंधी से ]
लड़खड़ाते रिश्तों में ]
फिर से] नव विश्वास जगा दे]
प्यारे छोटे भैया को भी ]
रंग बिरंगा] सुन्दर धागा]
जिम्मेदारी का] बोध करा दे]
वही राखी कहलाती है।
प्यारी बहनों को डी पी माथुर की स्वरचित रचना
की स्नेहिल भेंट
Sunday, May 10, 2015
बड़ा हो गया हूँ
- तुम कहती थी ना ,
कब
बड़ा होगा, मेरा लाल,
लो माँ,आज मैं बड़ा
हो गया हूँ ,
शायद इसीलिए, तुमसे बिछुड़ गया हूँ ,
जमाने की भीड़
में खो गया हूँ ,
लो
माँ, आज मैं बड़ा हो गया हूँ ,
- खो दिया है मैने तुमको,
अब
सुकून कहाँ से आयेगा,
सर्द रात में हौले से,
अब
कम्बल कौन ओढ़ाएगा,
बिन मांगे ही सबमें मेरा,
हिस्सा
कौन दिलाएगा,
बेटा झूँठ नही बोलता,
मेरा
झूँठ कौन छिपायेगा,
खुलकर हँसता था,तेरे पास,
अब
छिपकर सिसक रहा हूँ ,
लो माँ,आज मैं बड़ा
हो गया हूँ ,
जमाने
की भीड़ में खो गया हूँ ,
- मेरी छोटी छोटी बातों को,
कौन, धैर्य से सुन पाएगा,
पिता की डाँट से,
अब कौन
मुझे बचाएगा,
देर से सोया था, सोने दो,
ये सुकून
कैसे मिल पाएगा,
बुरी नजर से बचाने को,
ललाट
पर,चांद कौन बनाएगा,
होकर भी अनजान हो गया हूँ ,
लो माँ, आज मैं बड़ा हो गया हूँ ,
जमाने की भीड़
में खो गया हूँ
- कुर्सी तो अब भी पड़ी है माँ
पर तुम
नजर नही आती,
भोजन तो अब भी, पकता है माँ,
पर खुशबू
क्यूं नही आती,
आन्टी तो,रोज दिखती है माँ,
पर वो, अन्जु की माँ, नही पुकारती,
सफाई वाली तो,अब भी आती है माँ,
पर देखो
ना, पुरानी साड़ी नही मांगती,
ग्यारस तो अब भी आती है माँ,
पर मन्दिर
की, पुजारिन क्यूं नही आती,
लिखता तो अब भी हूँ माँ,
पर कोई
गलती नजर नही आती,
दिखावे के लिए मुस्कुरा रहा हूँ ,
लो माँ,आज मैं बड़ा हो गया हूँ ,
जमाने की भीड़
में खो गया हूँ ,
माँ
को कलम का समर्पण
दुर्गा
प्रसाद माथुर 10-05-2015
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